इस्लामी कैलेंडर को हिजरी कैलेंडर इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी शुरुआत पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हिजरत से जुड़ी हुई है। हिजरत का मतलब है प्रवास या स्थानांतरण, और यह वह ऐतिहासिक घटना है जब पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और उनके साथियों ने मक्का से मदीना की ओर हिजरत की। यह घटना 622 ईसवी में हुई, जो इस्लाम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई।
मक्का में शुरुआती दौर में मुसलमानों पर कुरैश मुर्ति पुजकों का अत्याचार बढ़ता जा रहा था। पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दबाव डाला जा रहा था कि वे इस्लाम का प्रचार बंद कर दें, लेकिन पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सत्य का साथ नहीं छोड़ा। आखिरकार, अल्लाह के हुक्म से पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मदीना की ओर हिजरत का फैसला किया। मदीना के लोग (अंसार) पहले से ही इस्लाम की तरफ झुक चुके थे और उन्होंने पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को आमंत्रित किया था। हिजरत के दौरान पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और हजरत अबू बकर रजियल्लाहु अन्हु ने गार-ए-सौर में छिपकर जान बचाई, और फिर सुरक्षित मदीना पहुंचे।
मदीना पहुंचकर पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पहली मुस्लिम उम्माह की बुनियाद रखी। यहां इस्लाम एक व्यक्ति की आस्था से आगे बढ़कर एक पूरा समाज और राज्य बन गया। मस्जिद-ए-नबवी की तामीर हुई, मुहाजिरीन और अंसार के बीच भाईचारा कायम हुआ, और इस्लाम का प्रसार तेजी से हुआ। हिजरत ने इस्लाम को मजबूती दी और मुसलमानों को आजादी से दीन पर अमल करने का मौका मिला। यही वजह है कि इस घटना को इस्लाम की नई शुरुआत माना जाता है।
हिजरी कैलेंडर की औपचारिक शुरुआत पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दौर में नहीं हुई थी। उस समय तारीखें किसी खास घटना के आधार पर लिखी जाती थीं, जैसे 'फील के साल' (हाथी वाले साल)। लेकिन खलीफा उमर बिन खत्ताब रजियल्लाहु अन्हु के दौर में (लगभग 638 ईसवी में) इस्लामी राज्य के प्रशासनिक कामों के लिए एक स्थायी कैलेंडर की जरूरत पड़ी। एक बार अबू मूसा अशअरी रजियल्लाहु अन्हु ने खलीफा उमर बिन खत्ताब रजियल्लाहु अन्हु को पत्र लिखा कि सरकारी दस्तावेजों में सिर्फ महीने का नाम लिखा होता है, जैसे शाबान, लेकिन पता नहीं चलता कि कौन सा शाबान – बीता हुआ या आने वाला।
इस पर हजरत खलीफा उमर बिन खत्ताब रजियल्लाहु अन्हु ने सहाबाओ से मशवरा किया। कुछ ने सुझाव दिया कि पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पैदाइश से शुरू करें, कुछ ने नबूवत के साल से, तो कुछ ने वफात से। लेकिन अंत में फैसला हुआ कि हिजरत के साल से कैलेंडर शुरू किया जाए, क्योंकि यह वह घटना थी जिसने मुस्लिम उम्माह को एक नई जिंदगी दी। हिजरत का साल 1 हिजरी माना गया। पहला महीना मुहर्रम चुना गया, क्योंकि हज के बाद नया साल शुरू होना मुनासिब था।
इस तरह कैलेंडर को हिजरी कहा गया, क्योंकि यह हिजरत से जुड़ा हुआ है। यह चंद्रमा पर आधारित है, जिसमें 12 महीने और 354 या 355 दिन होते हैं। आज भी मुसलमान इसी कैलेंडर से रमजान, हज, ईद जैसी इबादतों की तारीखें तय करते हैं। हिजरत और हिजरी का यह रिश्ता हमें याद दिलाता है कि इस्लाम की तरक्की मुश्किलों से गुजरकर ही हुई, और हिजरत का सबक आज भी है – जुल्म से भागना नहीं, बल्कि बेहतर जगह जाकर दीन को मजबूत करना।
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