किताबें और मुसलमान: ज्ञान से दूरी की चुनौती
आज के समय में जब दुनिया ज्ञान और शिक्षा के नए-नए आयाम छू रही है, तब मुस्लिम समाज का एक बड़ा हिस्सा किताबों और पढ़ाई-लिखाई से दूर होता दिखाई देता है। यह एक चिंताजनक स्थिति है, क्योंकि इस्लामी सभ्यता का इतिहास गवाह है कि ज्ञान, शिक्षा और किताबों से मुसलमानों ने कभी पूरी दुनिया को रोशनी दी थी। लेकिन आज ऐसा लगता है कि किताबों से जुड़ाव कमजोर हो गया है और उसकी जगह व्यापार और खाने-पीने के धंधों ने ले ली है।
मस्जिदों के आसपास, जहाँ कभी किताबों के स्टॉल, तफसीर, हदीस और इस्लामी इतिहास की किताबें मिलती थीं, वहाँ आज ज्यादातर खाने-पीने की दुकानें दिखाई देती हैं। चाय, कबाब, बिरयानी, मीठे पकवान की दुकानों की कतार लग जाती है, लेकिन किताबों की अलमारियाँ, लाइब्रेरी या बुक स्टॉल न के बराबर दिखते हैं। यह बदलाव केवल बाजार की आदत का नहीं, बल्कि हमारी सोच में आए बदलाव का भी सबूत है।
कभी मुस्लिम समाज को “क़लम” और “इल्म” से पहचाना जाता था। कुरआन की पहली ही वह़ी "इक़रा" यानी "पढ़ो" के हुक्म से शुरू होती है। लेकिन आज यही समाज पढ़ाई से दूरी बनाता जा रहा है। युवाओं का बड़ा हिस्सा किताबों से दूर हो चुका है। किताबें पढ़ना, शोध करना या नए ज्ञान की खोज करना, यह सब उनके जीवन की प्राथमिकता में नहीं रहा। यह दूरी सिर्फ धार्मिक किताबों से नहीं, बल्कि आधुनिक शिक्षा और विज्ञान की किताबों से भी बढ़ती जा रही है।
इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण है शिक्षा की अहमियत को न समझना। कई जगहों पर आज भी यह सोच पाई जाती है कि पढ़ाई-लिखाई से सिर्फ डिग्री मिलती है, जबकि ज्ञान और किताबें इंसान के सोचने का तरीका बदलती हैं और समाज को नई राह दिखाती हैं। दूसरा कारण है रोज़गार के आसान रास्ते चुनना। लोग जल्दी पैसे कमाने के लिए छोटे व्यापार और खाने-पीने की दुकानों की ओर झुकते हैं, क्योंकि इसमें पढ़ाई की मेहनत नहीं करनी पड़ती। तीसरा कारण है किताबों तक पहुँच की कमी और पढ़ने की आदत का खत्म होना।
खाने-पीने के धंधे बुरे नहीं हैं। यह मेहनत और रोज़ी-रोटी का जरिया है और इस्लाम में मेहनत की रोज़ी को अहमियत दी गई है। समस्या तब आती है जब समाज का बड़ा हिस्सा इसी में सीमित रह जाए और शिक्षा, रिसर्च, साहित्य और कला से दूरी बना ले। इससे समाज का बौद्धिक विकास रुक जाता है। जब किताबों की जगह सिर्फ खाने-पीने की दुकानें हावी हो जाती हैं, तो यह संकेत है कि समाज ज्ञान की बजाय उपभोग पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।
एक और पहलू यह है कि आज की पीढ़ी किताबों की बजाय मोबाइल और सोशल मीडिया में ज्यादा समय बिताती है। ज्ञान की गहराई और तसल्ली जो किताबों से मिलती है, वह कुछ मिनट के वीडियो या पोस्ट से नहीं मिल सकती। किताब पढ़ने से सोचने की आदत पैदा होती है, कल्पना की दुनिया खुलती है और इंसान के अंदर सवाल उठते हैं। यही सवाल आगे चलकर नए विचार और बदलाव लाते हैं।
मुस्लिम समाज का इतिहास गवाह है कि जब तक वह किताबों से जुड़ा रहा, तब तक उसने ज्ञान, विज्ञान, चिकित्सा, वास्तुकला और साहित्य के क्षेत्र में दुनिया की अगुवाई की। अल-ख़्वारिज़्मी, इब्न सीना, अल-बिरूनी, इब्न खलदून जैसे विद्वान उसी समाज से निकले जिसने शिक्षा को प्राथमिकता दी थी। लेकिन आज हम उस परंपरा से दूर जा रहे हैं।
जरूरत है कि हम किताबों की ओर लौटें। मस्जिदों के आसपास खाने-पीने की दुकानों के साथ-साथ किताबों के स्टॉल भी लगें। बच्चों और युवाओं के लिए लाइब्रेरी खोली जाए। घरों में टीवी और मोबाइल के साथ किताबों की अलमारियाँ भी हों। माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ने की आदत डालें। पढ़ाई-लिखाई को सिर्फ डिग्री या नौकरी पाने का जरिया न समझा जाए, बल्कि इसे समाज को उठाने का माध्यम माना जाए।
आज की चुनौती यह है कि किताबों से दूरी सिर्फ धार्मिक शिक्षा को नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास को भी प्रभावित कर रही है। जिस समाज के पास ज्ञान नहीं होता, वह समय के साथ पीछे छूट जाता है। इसलिए जरुरी है कि हम अपनी प्राथमिकताओं को बदलें और फिर से किताबों से जुड़ें।
किताबें सिर्फ अतीत की याद नहीं, बल्कि भविष्य की राह दिखाने वाली रोशनी हैं। अगर मुस्लिम समाज फिर से किताबों से नाता जोड़ेगा, तो न केवल वह अपनी पिछली शान को पा सकता है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मजबूत नींव रख सकेगा।
Blog Comments (0)