इस्लाम में "दय्यूष" (Dayyus या Dayooth) एक महत्वपूर्ण और गंभीर शब्द है, जो अरबी भाषा से लिया गया है। यह उन पुरुषों को संबोधित करता है जिनमें अपनी महिलाओं (महिलाओं, बहनों, बेटियों, मां आदि) के प्रति ग़ैरत (protective jealousy या honor) का अभाव होता है। सरल शब्दों में, दय्यूष वह व्यक्ति है जो अपनी घर की महिलाओं की बेपर्दगी, बेहयाई या नामहरमों के साथ अनुचित मेल-जोल को देखकर भी चुप रहता है, विरोध नहीं करता या उसे स्वीकार कर लेता है।
इस्लाम में ग़ैरत को पुरुषों के लिए एक बहुत बड़ा गुण माना गया है। यह परिवार की इज्जत, महिलाओं की हिफाजत और समाज की नैतिकता की रक्षा करता है। लेकिन जब कोई पुरुष इस ग़ैरत को खो देता है और अपनी औरतों को बिना किसी रोक-टोक के खुले-आम बेपर्दा घूमने, गैर-महरमों से बातें करने, टाइट कपड़े पहनने या अन्य गलत कामों में शामिल होने देता है, तो उसे दय्यूष कहा जाता है। यह शब्द केवल पति के लिए नहीं, बल्कि भाई, पिता या किसी भी ऐसे पुरुष के लिए इस्तेमाल होता है जो अपनी महरम महिलाओं की हिफाजत करने में असफल रहता है।
हदीसों में दय्यूष की सजा
हजरत मुहम्मद ﷺ ने दय्यूष के बारे में बहुत सख्त चेतावनी दी है। एक हदीस में फरमाया गया है कि तीन तरह के लोग जन्नत में कभी दाखिल नहीं होंगे:
1. माता-पिता की नाफरमानी करने वाला,
2. पुरुषों जैसा रूप-रंग और कपड़े पहनने वाली औरत,
3. दय्यूष ।
कुछ रिवायतों में शराबी, माता-पिता की नाफरमानी करने वाला और दय्यूष का जिक्र है। जब सहाबा किराम ने पूछा कि दय्यूष कौन है, तो रसूल ﷺ ने फरमाया: “वह व्यक्ति जो अपनी बीवी के साथ किसके आने-जाने की परवाह नहीं करता।” यानी जो अपनी पत्नी या अन्य महिलाओं के साथ गैर-महरमों के आने-जाने, बातचीत या बेहयाई को बर्दाश्त कर लेता है।
एक और हदीस में इब्ने उमर रजि. से रिवायत है कि अल्लाह तीन लोगों की तरफ कयामत के दिन नहीं देखेगा और उन्हें जन्नत में दाखिल नहीं करेगा: माता-पिता की नाफरमानी करने वाला, पुरुषों की नकल करने वाली औरत और दय्यूष।
इब्ने कय्यिम रह. जैसे बड़े उलेमा ने फरमाया कि दय्यूष अल्लाह की मखलूकात में सबसे खराब है क्योंकि उसमें ग़ैरत नाम की चीज ही नहीं रहती। ग़ैरत का मतलब है कि अपनी इज्जत और परिवार की पाकदामनी पर जलन महसूस करना। अगर कोई पुरुष अपनी बीवी को मेकअप, परफ्यूम और आकर्षक कपड़ों में बाजार भेजता है, या उसकी बहन-बेटी को बॉयफ्रेंड के साथ घूमने देता है, या घर में टीवी-ड्रामा देखकर बेहयाई फैलने देता है, तो वह दय्यूष की श्रेणी में आता है।
दय्यूष की विशेषताएं क्या हैं?
- अपनी बीवी, बहन या बेटी को बिना हिजाब या शरीयत के मुताबिक पर्दे के बाहर भेजना।
- उन्हें टाइट, ट्रांसपेरेंट या फैशनेबल कपड़े पहनने देना जो गैर-महरमों की नजरों को आकर्षित करें।
- घर में नामहरमों के साथ फ्री मिक्सिंग (आजादी से मिलना-जुलना) को बर्दाश्त करना।
- अगर कोई गलत काम हो रहा हो तो चुप रहना या “आजकल का जमाना है” कहकर टाल देना।
- अपनी महिलाओं की तारीफ गैर-मर्दों से सुनकर खुश होना।
- सोशल मीडिया पर बेपर्दा फोटो-वीडियो पोस्ट करने देना।
ये सब काम दय्यूष की निशानियां हैं। आज के दौर में सोशल मीडिया, वेस्टर्न कल्चर और फ्री मिक्सिंग के कारण यह समस्या बहुत बढ़ गई है। कई पुरुष अपनी पत्नी या बेटियों को “आधुनिक” बनने के नाम पर बेपर्दा घूमने देते हैं और खुद को “प्रोग्रेसिव” समझते हैं। लेकिन इस्लाम की नजर में यह गुनाह है और जन्नत से महरूम होने का कारण।
क्यों है दय्यूष इतना गंभीर गुनाह?
इस्लाम परिवार को समाज की बुनियाद मानता है। अगर घर की नींव कमजोर हो जाए, यानी पुरुष अपनी जिम्मेदारी न निभाए, तो पूरा समाज बिगड़ जाता है। महिलाओं की हिफाजत पुरुष की जिम्मेदारी है। जब पुरुष ग़ैरत खो देता है, तो जाहिलियत का दौर लौट आता है जहां औरतें बिना किसी सुरक्षा के खुले आम घूमती थीं।
रसूल ﷺ ने फरमाया कि ग़ैरत ईमान का हिस्सा है। जो व्यक्ति ग़ैरत रखता है, वह अपनी परिवार की इज्जत की रक्षा करता है। लेकिन दय्यूष में यह ईमान की रोशनी खत्म हो जाती है। इसलिए उसकी सजा बहुत सख्त है – जन्नत में दाखिला नहीं मिलेगा।
आज के समाज में दय्यूष की उदाहरण
आजकल कई परिवारों में देखा जाता है कि पिता या पति अपनी बेटी या बीवी को अकेले पार्टी, शॉपिंग या ऑफिस भेजते हैं। वे जानते हैं कि वहां गैर-महरम हैं, फिर भी “ट्रस्ट” के नाम पर चुप रहते हैं। या फिर लड़कियां सोशल मीडिया पर रील्स बनाती हैं, डांस करती हैं और माता-पिता लाइक्स देखकर खुश होते हैं। ये सब दय्यूष की निशानियां हैं।
इसके विपरीत, सच्चा मुसलमान पुरुष अपनी महिलाओं को शरीयत के मुताबिक पर्दे में रखता है, उन्हें अच्छी तालीम देता है और किसी भी बेहयाई से बचाता है। वह जानता है कि अल्लाह के सामने जवाबदेह वह खुद होगा।
समाधान क्या है?
- पुरुषों को अपनी ग़ैरत जागृत करनी चाहिए। परिवार की महिलाओं को इस्लामी तालीम देनी चाहिए।
- महिलाओं को खुद भी हिजाब और पर्दे की अहमियत समझनी चाहिए।
- समाज में इस्लामी मूल्यों को बढ़ावा देना चाहिए ताकि बेपर्दगी को सामान्य न समझा जाए।
- उलेमा और विद्वानों की बातों को सुनना चाहिए, जैसे मुफ्ती तारिक मसूद, मुफ्ती सलमान अजहरी आदि जिन्होंने दय्यूष पर विस्तार से बयान किया है।
दय्यूष बनना कोई छोटी बात नहीं। यह ईमान की कमजोरी है। हर मुसलमान पुरुष को चाहिए कि वह अल्लाह से डरे, अपनी परिवार की हिफाजत करे और जन्नत हासिल करने की कोशिश करे। ग़ैरत रखना अल्लाह की रजामंदी का जरिया है, जबकि दय्यूष बनना उसकी नाराजगी का सबब।
अगर कोई व्यक्ति अपनी गलती महसूस कर ले और तौबा करे, तो अल्लाह बहुत रहम वाला है। वह तौबा कबूल करता है। लेकिन ग़ैरत के बिना परिवार और समाज दोनों तबाह हो जाते हैं। इसलिए हर मुसलमान को इस शब्द को समझना चाहिए और अपनी जिंदगी में ग़ैरत को जगह देनी चाहिए।
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