माता शैलपुत्री का स्वरूप
नवरात्रि के पहले दिन का विशेष महत्व है क्योंकि इसी दिन से शक्ति की उपासना का महापर्व आरंभ होता है। इस दिन भक्तजन माता शैलपुत्री की आराधना करते हैं, जिन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना गया है। वृषभ पर सवार और त्रिशूल व कमल धारण करने वाली शैलपुत्री माता शक्ति, धैर्य और स्थिरता की प्रतीक हैं। प्रतिपदा के दिन कलश स्थापना, अखंड ज्योति प्रज्वलित करना और माता का ध्यान करना परंपरागत रूप से किया जाता है। इस दौरान भक्त फलाहार करते हैं, जिसमें फल, दूध, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा और सेंधा नमक का सेवन शामिल है, जबकि गेहूँ, चावल, दाल, प्याज-लहसुन और मांसाहार से परहेज रखा जाता है।
शास्त्रों के अनुसार, शैलपुत्री माता की उपासना करने से साधक को मानसिक शांति और आत्मबल की प्राप्ति होती है। यह दिन उन लोगों के लिए भी शुभ माना गया है जो जीवन में नई शुरुआत करना चाहते हैं, क्योंकि माता शैलपुत्री हमें कठिन परिस्थितियों में भी अडिग रहने की प्रेरणा देती हैं। परिवार में सुख-समृद्धि, सौहार्द और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। नवरात्रि का पहला दिन केवल पूजा का दिन नहीं, बल्कि यह हमें यह भी सिखाता है कि दृढ़ संकल्प और श्रद्धा से हर कठिनाई पर विजय पाई जा सकती है।
पूजा और व्रत विधि
प्रतिपदा के दिन भक्तजन स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और कलश स्थापना करते हैं। घर के पूजा स्थान में अखंड ज्योति प्रज्वलित कर माता शैलपुत्री का ध्यान किया जाता है। इस दिन गायत्री मंत्र और दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के साथ माता को सफेद फूल अर्पित किए जाते हैं।
व्रत में क्या खाएँ?
- मौसमी फल (सेब, केला, अमरूद आदि)
- दूध और दही
- सूखे मेवे (बादाम, काजू, किशमिश)
- साबूदाना या सिंघाड़े के आटे से बने पकवान
- आलू और शकरकंद से बने व्यंजन
- सेंधा नमक
व्रत में क्या न खाएँ?
- गेहूँ और चावल
- दालें और अनाज
- प्याज और लहसुन
- सामान्य नमक
- मांसाहार और मदिरा
शैलपुत्री माता की पूजा का महत्व
नवरात्रि का पहला दिन खास माना जाता है क्योंकि यह पूरे पर्व की शुरुआत का प्रतीक है। माता शैलपुत्री की पूजा करने से मनुष्य को मानसिक शांति, आत्मबल और स्थिरता मिलती है। परिवार में सुख-समृद्धि और सौहार्द का वास होता है। विद्यार्थी और साधक के लिए यह दिन ज्ञान और एकाग्रता बढ़ाने वाला माना जाता है।
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