मध्य प्रदेश के नीमच, मंदसौर और रतलाम जिलों में बसा बाँछड़ा समुदाय एक ऐसी विडंबना का जीता-जागता उदाहरण है जहाँ बेटी का जन्म पूरे गाँव में उत्सव की तरह मनाया जाता है, लेकिन वही बेटी किशोरावस्था में पहुँचते ही परिवार की कमाऊ संपत्ति बन जाती है। इस समुदाय में लड़कियों को बोझ नहीं, बल्कि ‘आर्थिक भविष्य’ माना जाता है। वजह है पीढ़ियों से चली आ रही संस्थागत वेश्यावृत्ति की परंपरा, जिसे यहाँ के लोग ‘जातीय पेशा’ कहकर जायज ठहराते हैं।
इतिहास और सामाजिक संरचना
बाँछड़ा एक विमुक्त घुमंतू जनजाति है जिसे अंग्रेजों ने ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ के तहत अपराधी घोषित कर दिया था। आजादी के बाद भले ही ये कानून हट गया, पर कलंक नहीं हटा। जमीन, शिक्षा और रोजगार के परंपरागत साधनों से वंचित इस समुदाय ने पेट पालने के लिए देह-व्यापार को अपना लिया। धीरे-धीरे यह मजबूरी रिवाज में बदल गई। अब हालत ये है कि घर की बड़ी बेटी 12-13 साल की होते ही ‘धंधे’ में उतार दी जाती है। परिवार की पूरी अर्थव्यवस्था उसी पर टिकी होती है। पुरुष सदस्य आमतौर पर दिहाड़ी मजदूरी करते हैं या बेरोजगार रहते हैं, जबकि महिलाएं ही मुख्य कमाऊ सदस्य होती हैं।
‘जश्न’ के पीछे का सच
बाँछड़ा परिवारों में बेटी पैदा होने पर ढोल बजते हैं, मिठाई बँटती है। इसकी वजह ममता नहीं, बाजार है। लड़का पैदा होगा तो उसे दहेज देकर शादी करनी पड़ेगी। लड़की पैदा होगी तो वह कमाकर लाएगी और भाई की शादी के लिए 2-2.5 लाख रुपये का इंतजाम भी करेगी। यहाँ पंचायत का नियम है कि दूल्हे की बहन ही उसकी शादी का खर्च उठाएगी। अगर बहू शादी तोड़ना चाहे तो उसे दोगुनी रकम लौटानी पड़ती है। दोनों ही सूरतों में कीमत औरत को चुकानी पड़ती है। इस पूरे चक्र में महिला दोहरी मार झेलती है: पहले परिवार के लिए जिस्म बेचती है, फिर भाई की शादी का बोझ उठाती है।
शिक्षा: सबसे बड़ी दीवार
बाँछड़ा लड़कियों के लिए स्कूल का दरवाजा लगभग बंद है। पहला कारण परिवार का विरोध है। सदियों से घर की कमाऊ सदस्य रही लड़कियों को पढ़ाने का मतलब है आय का जरिया बंद करना। दूसरा कारण सरकारी सिस्टम है। आज भी कई स्कूल दाखिले के लिए पिता का नाम और दस्तावेज मांगते हैं। बाँछड़ा बच्चों को अक्सर अपने पिता का नाम ही नहीं पता होता। नतीजा यह कि ‘सेक्स वर्क से बाहर नौकरी नहीं मिलती क्योंकि पढ़े-लिखे नहीं हो, और पढ़ नहीं सकते क्योंकि सिस्टम ऐसे बना है’। एक समुदाय सदस्य बताती हैं कि 26-27 साल के बाद जब सेक्स वर्कर का ‘कामकाजी जीवन’ खत्म हो जाता है, तब उनके पास कोई विकल्प नहीं बचता। घरेलू काम मिल भी जाए तो ‘बाँछड़ा’ होने का ठप्पा पीछा नहीं छोड़ता।
कानून और हकीकत का फासला
मध्य प्रदेश सरकार ने 1998 में बाँछड़ा समुदाय में वेश्यावृत्ति खत्म करने की योजना बनाई थी। 2014 में इसे लागू कर नीमच, रतलाम और मंदसौर के लिए सालाना 10 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। लेकिन यह पैसा कहाँ जाता है, किसके पास जाता है, इसकी जानकारी खुद सेक्स वर्कर्स को नहीं है। PITA कानून में पुनर्वास का प्रावधान है, पर जो महिलाएं यह पेशा छोड़ना चाहती हैं उनके लिए कोई रास्ता नहीं है। पुलिस या कोर्ट में जाने से भी कुछ नहीं बदलता क्योंकि अंत में जवाबदेही पंचायत को ही देनी पड़ती है।
बदलाव की कोशिशें और चुनौतियाँ
2012 में वडिया गाँव में 8 शादियाँ और 13 सगाइयाँ एक साथ करवाई गईं ताकि लड़कियों को इस दलदल से निकाला जा सके। अफसरों का मानना था कि ‘शादी होते ही लड़की धंधे से बाहर हो जाती है’। कुछ एनजीओ जैसे ‘उड़ान’ काउंसलिंग के जरिए महिलाओं को बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं। समुदाय की कुछ महिलाएं खुद राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सेक्स वर्क को कानूनी मान्यता देने की मांग कर रही हैं ताकि उन्हें बुनियादी अधिकार मिल सकें।
लेकिन रास्ता आसान नहीं है। गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक स्वीकृति इस चक्र को तोड़ने नहीं देती। 2017 में इंदौर हाईकोर्ट में दायर याचिका में कहा गया कि नाबालिग लड़कियों को भी जबरन धंधे में धकेला जा रहा है।
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