भारत जैसे विविधता से भरे देश में जहाँ भाषाएँ, संस्कृतियाँ और धर्म एक साथ साँस लेते हैं, वहाँ शिक्षा (तालीम) हर समुदाय की प्रगति की कुंजी है। लेकिन जब हम भारतीय मुसलमानों की सामाजिक स्थिति पर नज़र डालते हैं, तो तालीम का सवाल सबसे अहम और सबसे संवेदनशील बन जाता है।
तालीम न केवल रोज़गार और आर्थिक विकास का ज़रिया है, बल्कि यह एक ऐसी रोशनी है जो इंसान के सोचने, समझने और समाज में अपनी भूमिका निभाने के तरीके को भी बदल देती है।
भारत के मुसलमानों का शिक्षा से जुड़ाव कोई नया नहीं है। मध्यकालीन भारत में जब मुग़ल और दिल्ली सल्तनत का दौर था, तब तालीमी इदारों (शैक्षणिक संस्थानों) की भरमार थी — मदरसे, मख़तब और दारुल उलूम जैसे संस्थान धार्मिक और बौद्धिक शिक्षा का केंद्र थे। उस दौर में फ़ारसी, अरबी और उर्दू के ज़रिए तालीम दी जाती थी और कई बड़े विद्वान इसी समाज से निकले।
लेकिन अंग्रेज़ों के आने के बाद, भारत की तालीमी व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया। आधुनिक शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम और पश्चिमी ढांचे में ढल गई, जबकि मुसलमानों का एक बड़ा तबका पारंपरिक शिक्षा से चिपका रहा। यह बदलाव समझने और अपनाने में देर हुई, और यही देरी बाद में एक बड़ी सामाजिक-शैक्षणिक दूरी में बदल गई।
आजादी के इतने सालों बाद भी भारतीय मुसलमानों की शिक्षा दर राष्ट्रीय औसत से कम है।
सच्चर कमेटी रिपोर्ट (2006) के अनुसार, मुसलमानों की शैक्षिक स्थिति देश के कई पिछड़े वर्गों से भी नीचे है।
मुसलमानों की शिक्षा में कमी के कई कारण हैं, जिन्हें समझना ज़रूरी है।
सबसे पहले आर्थिक पिछड़ापन — बहुत से परिवारों की स्थिति कमजोर होने के कारण बच्चे जल्दी काम पर लग जाते हैं या पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं।
दूसरा, जागरूकता की कमी — शिक्षा को अब भी कई जगह सिर्फ “रोज़गार का जरिया” समझा जाता है, जबकि यह सामाजिक सशक्तिकरण का भी माध्यम है।
तीसरा, मदरसा और आधुनिक शिक्षा के बीच की खाई — कई परिवार धार्मिक शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं, जिससे बच्चे विज्ञान, गणित और तकनीकी विषयों से दूर रह जाते हैं।
इसके अलावा, सरकारी नीतियों का लाभ अक्सर पूरी तरह उन तक नहीं पहुँच पाता।
मुसलमानों की तालीम को मज़बूत करने के लिए कुछ ठोस कदम ज़रूरी हैं।
सबसे पहले प्राथमिक शिक्षा पर ज़ोर दिया जाए ताकि हर बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचे।
मदरसा शिक्षा में आधुनिक विषय जोड़े जाएँ ताकि बच्चे धार्मिक और दुनियावी दोनों ज्ञान में आगे बढ़ें।
महिलाओं की शिक्षा में निवेश किया जाए और बेटियों की तालीम को ज़िम्मेदारी के रूप में देखा जाए।
प्रतिभाशाली लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए छात्रवृत्ति और कोचिंग सेंटर की व्यवस्था हो।
सबसे महत्वपूर्ण है समाज की मानसिकता में बदलाव — यह समझना होगा कि तालीम केवल दुनियावी कामयाबी नहीं, बल्कि यह इस्लामी तालीम का भी हिस्सा है क्योंकि इस्लाम ने भी “इल्म” को सबसे बड़ा दर्जा दिया है।
तालीम एक ऐसी रोशनी है जो दिलों और दिमागों में उजाला करती है।
भारतीय मुसलमानों के लिए अब वक्त है कि वे इस रोशनी को हर घर तक पहुँचाएँ।
बीते जमाने की कमियों को पीछे छोड़कर, आधुनिक शिक्षा और तकनीक को अपनाकर ही समाज आत्मनिर्भर और मज़बूत बन सकता है।
अगर तालीम हर बच्चे का हक़ बने, तो आने वाली नस्लें न केवल अपने समुदाय को बल्कि पूरे मुल्क को नई ऊँचाइयों तक ले जाएँगी।
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