भारत की धरती हमेशा से विविधता और संस्कृतियों का घर रही है। यहाँ अलग-अलग धर्म, जाति और विचारधाराएँ समय-समय पर आईं और एक-दूसरे को प्रभावित करती रहीं। जब इस्लाम भारत पहुँचा, तो उसने सिर्फ शासन ही नहीं बल्कि एक नई सोच और सामाजिक व्यवस्था भी प्रस्तुत की। इस्लाम का संदेश था – “सब इंसान बराबर हैं और एक ही ईश्वर के बंदे हैं।” यह विचार भारत की उस व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बना, जहाँ जाति और जन्म के आधार पर भेदभाव गहरा था।
भारत में सदियों से अनेकों जातियां के लोगों द्वारा आक्रमण किया गया लेकिन अंत में वह सभी आक्रमणकारी भारत की संस्कृति से प्रभावित होकर यही घुल मिल गए मतलब उनकी संस्कृति व रहन-सहन भारतीय संस्कृति से इतना घुल मिल गए कि आज के दौर में ये पहचान पाना लगभग नामुमकिन सा है कि यह भारत के बाहर से आए हुए आक्रमणकारी हैं जब तक कि उनका इतिहास ना खांगाला जाये। लेकिन जब 17वीं शताब्दी में मुस्लिम आक्रांत मोहम्मद बिन कासिम ने भारत के राज्य सिंह पर आक्रमण किया और उसे अपने अधिकार में लिया तो उसने भारत की संस्कृति को अपनी इस्लामी संस्कृति से बहुत प्रभावित किया यह प्रभाव इतना गहरा था कि उसका प्रभाव आज भी भी भारत में बना हुआ है क्योंकि मुसलमान जब भारत में आए तो भी अपने साथ एक बहुत बड़ी व्यवस्था लेकर आए। उनके पास एक अपनी भाषा थी जो की उनके रहन-सहन से मेल खाती थी उनका रहन-सहन खान-पान भारत की संस्कृति से लगभग मिलता-जुलता था खासकर दलित की खान-पान से और वे अपने धार्मिक विचार जो की समानता का अधिकार रखता है को लेकर आए जिसने भारत की संस्कृति को काफी प्रभावित किया।
आई अब स्टेप बाय स्टेप बहुत ही सरल व आसान शब्दों में समझते हैं कि भारत में आज भी मुसलमान क्यों बने हुए हैं और उनको यहां से निकल पाना लगभग नामुमकिन है।
मुसलमानों का भारत में आगमन
- 7वीं सदी में अरब व्यापारी सबसे पहले केरल और गुजरात के तटों तक पहुँचे।
- 8वीं सदी में मोहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध पर कब्ज़ा किया।
- 11वीं और 12वीं सदी में तुर्क और अफ़ग़ान शासक दिल्ली सल्तनत स्थापित करने लगे।
- बाद में मुग़लों का दौर आया, जिसने भारतीय समाज और संस्कृति पर गहरा असर डाला।
- इस तरह मुसलमान सिर्फ “आक्रांता” नहीं बल्कि व्यापारी, शासक और सूफ़ी संत बनकर भारत के समाज में रच-बस गए।
मुसलमान क्या लेकर आए?
(क) तौहीद (एक ईश्वर का संदेश)
- इस्लाम ने कहा कि एक ही ख़ुदा है, सब उसी के बन्दे हैं।
- किसी इंसान को उसकी जाति, नस्ल या जन्म से ऊँचा या नीचा नहीं कहा जा सकता।
- यह बात दबे-कुचले लोगों को बहुत भायी, क्योंकि यहाँ जाति से नहीं बल्कि इंसानियत और तक़्वा (पवित्रता) से इज़्ज़त मिलती थी।
(ख) बराबरी का संदेश
- मस्जिद में अमीर-ग़रीब, राजा-रंक, ऊँची-नीची जाति का फ़र्क़ मिट जाता था।
- सब एक ही सफ़ में, एक ही अल्लाह के सामने सज्दा करते थे।
- यह उस समाज के लिए क्रांतिकारी विचार था जहाँ छुआछूत और भेदभाव गहरे थे।
(ग) सामाजिक न्याय और इंसाफ़
- इस्लामी क़ानून में ज़ुल्म और शोषण के खिलाफ़ सख़्त आदेश थे।
- ग़रीबों, अनाथों और मज़लूमों के हक़ की रक्षा इस्लाम की बुनियादी शिक्षा थी।
- जज़िया जैसे टैक्स भले बाद में विवाद का कारण बने, लेकिन इस्लाम का शुरुआती संदेश इंसाफ़ और बराबरी का था।
(घ) सूफ़ीवाद और आध्यात्मिकता
- भारत में मुसलमान सिर्फ तलवार लेकर नहीं आए, बल्कि सूफ़ी भी आए।
- ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, निज़ामुद्दीन औलिया जैसे सूफ़ियों ने प्यार, इंसानियत और भाईचारे का पैग़ाम दिया।
- सूफ़ियों की खानकाहें जात-पात से ऊपर थीं – वहाँ हर कोई खाना खा सकता था, रह सकता था।
- इसने आम लोगों के दिल जीत लिए।
ब्राह्मणवाद और समाज की स्थिति
- उस समय भारत में जाति व्यवस्था बहुत सख़्त थी।
- ऊँची जातियों (विशेषकर ब्राह्मण) के पास धार्मिक और सामाजिक सत्ता थी।
- शूद्र और तथाकथित अछूत जातियों के साथ बहुत भेदभाव होता था:
- उन्हें मंदिर में प्रवेश की इजाज़त नहीं।
- वे वेद-उपनिषद नहीं पढ़ सकते थे।
- समाज में उनके लिए अपमानजनक काम तय थे।
- यानी भारतीय समाज में गहरी असमानता और उत्पीड़न था।उस समय भारत में जाति व्यवस्था बहुत सख़्त थी।
ऊँची जातियों (विशेषकर ब्राह्मण) के पास धार्मिक और सामाजिक सत्ता थी।
शूद्र और तथाकथित अछूत जातियों के साथ बहुत भेदभाव होता था:
उन्हें मंदिर में प्रवेश की इजाज़त नहीं।
वे वेद-उपनिषद नहीं पढ़ सकते थे।
समाज में उनके लिए अपमानजनक काम तय थे।
यानी भारतीय समाज में गहरी असमानता और उत्पीड़न था।
ब्राह्मणवाद को मिली चुनौती
- ब्राह्मणवाद जातीय श्रेष्ठता पर टिका हुआ था।
- इस्लाम ने कहा कि इंसान की इज़्ज़त उसके कर्म और ईमान से है, न कि जन्म से।
- शूद्र और दलित जातियों के लिए यह विचार आज़ादी और सम्मान की हवा बन गया।
- बहुत-से लोगों ने जाति की बेड़ियों को तोड़कर इस्लाम अपनाया।
- यही कारण था कि इस्लाम सिर्फ तलवार से नहीं फैला बल्कि अपने न्यायपूर्ण और बराबरी वाले संदेश से लोगों के दिलों में उतर गया।
मुसलमान भारत में क्यों जम गए?
- क्योंकि इस्लाम सिर्फ शासन नहीं बल्कि एक जीवनशैली और समाजिक बराबरी लेकर आया।
- कई जातियों ने इस्लाम अपनाया, तो मुसलमान सिर्फ "बाहरी आक्रांता" नहीं रहे बल्कि भारत की मिट्टी में रच-बस गए।
- आज भारत में मुसलमान सबसे बड़ा अल्पसंख्यक हैं और उनकी जड़ें यहाँ इतनी गहरी हैं कि उन्हें "निकाल पाना" न सामाजिक तौर पर और न राजनीतिक तौर पर मुमकिन है।
मुसलमान भारत में सिर्फ़ आक्रांता बनकर नहीं टिके, बल्कि इसलिए जमे क्योंकि उन्होंने बराबरी, भाईचारा और इंसाफ़ का पैग़ाम दिया। यह पैग़ाम उस समय की जातिवादी व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती था।
ब्राह्मणवाद की ऊँच-नीच की सोच के बरअक्स इस्लाम ने सबको बराबरी का दर्जा दिया। यही वजह है कि मुसलमान भारत में गहराई से बस गए और आज भी इस मुल्क की गंगा-जमुनी तहज़ीब का अहम हिस्सा हैं।
FAQ Section
Q1. मुसलमान संस्कृति ने ब्राह्मणवाद को कैसे प्रभावित किया?
मुसलमान संस्कृति ने बराबरी, भाईचारे और इंसाफ़ का पैग़ाम दिया, जिसने जातिवाद पर टिकी ब्राह्मणवादी सोच को चुनौती दी।
Q2. दलितों ने मुसलमान संस्कृति को क्यों अपनाया?
क्योंकि इसमें जाति-भेद नहीं था। मस्जिद और खानकाह में सबको बराबरी और सम्मान मिला।
Q3. क्या सूफ़ी संतों का दलित समाज पर असर पड़ा?
हाँ, सूफ़ी संतों की खानकाहें सभी के लिए खुली थीं। दलितों को वहाँ इज़्ज़त, सुरक्षा और आध्यात्मिक शांति मिली।
Q4. क्या ब्राह्मणवाद को बदलाव के लिए मजबूर होना पड़ा?
जी हाँ, मुसलमान संस्कृति और दलितों के झुकाव ने ब्राह्मणवाद को सामाजिक सुधार की दिशा में सोचने के लिए बाध्य किया।
Thanks for reading….
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