सऊदी अरब केवल इस्लाम का केंद्र ही नहीं, बल्कि इस्लामी अर्थव्यवस्था (Islamic Economy) का भी सबसे बड़ा उदाहरण है। यहाँ का बैंकिंग सिस्टम दुनिया के अन्य देशों से अलग है, क्योंकि यह कुरआन और हदीस पर आधारित “इस्लामिक बैंकिंग सिस्टम” के सिद्धांतों पर चलता है।इस प्रणाली का उद्देश्य है — आर्थिक स्थिरता के साथ-साथ हलाल (वैध) तरीकों से वित्तीय लेनदेन को बढ़ावा देना।
इस्लामी बैंकिंग क्या है?
इस्लामी बैंकिंग एक ऐसी वित्तीय प्रणाली है जो शरिया (इस्लामी कानून) के अनुरूप होती है। इसमें “रिबा (ब्याज)” को हराम माना गया है, और किसी भी प्रकार के “अन्यायपूर्ण लाभ” या “सट्टा (Gambling)” को भी निषिद्ध किया गया है।
कुरआन में अल्लाह तआला ने फरमाया है:
“अल्लाह ने व्यापार को हलाल किया और ब्याज को हराम ठहराया।”
(सूरह अल-बक़रा 2:275)
यानी इस्लाम व्यापार और साझेदारी को बढ़ावा देता है, लेकिन ब्याज पर पैसा कमाने को गलत ठहराता है।
सऊदी अरब का बैंकिंग ढांचा
सऊदी अरब का बैंकिंग सिस्टम SAMA (Saudi Arabian Monetary Authority) द्वारा नियंत्रित होता है। SAMA देश के सभी बैंकों, बीमा कंपनियों और वित्तीय संस्थानों पर निगरानी रखता है ताकि वे शरिया के सिद्धांतों का पालन करें।
आज सऊदी अरब में 30 से अधिक बैंक सक्रिय हैं, जिनमें प्रमुख हैं।……..
अल रजही बैंक (Al Rajhi Bank)
नेशनल कमर्शियल बैंक (NCB)
बैंक अल जज़ीरा
रियाद बैंक
सऊदी ब्रिटिश बैंक (SABB)
इनमें से कई बैंक पूरी तरह इस्लामी बैंक हैं, जबकि कुछ “हाइब्रिड मॉडल” अपनाते हैं, यानी पारंपरिक और इस्लामी दोनों सेवाएँ प्रदान करते हैं।
ब्याज रहित (Interest-Free) व्यवस्था
इस्लामी बैंकिंग का सबसे अहम नियम है — ब्याज से परहेज (No Interest / No Riba)। ब्याज की जगह यहाँ मुनाफा आधारित लेनदेन होते हैं।
कुछ प्रमुख इस्लामी वित्तीय मॉडल इस प्रकार हैं:……..
1. मुराबाहा (Murabaha)
बैंक ग्राहक की आवश्यकता की वस्तु खरीदता है और उसे तय मुनाफे के साथ बेच देता है। उदाहरण: बैंक ग्राहक के लिए कार खरीदकर उसे 5% लाभ जोड़कर बेच सकता है।
2. मुदारबा (Mudarabah)
इसमें एक पक्ष पूंजी लगाता है और दूसरा काम करता है। मुनाफा तय अनुपात में बाँटा जाता है, नुकसान पूंजीदाता को होता है।
3. मुशरका (Musharakah)
साझेदारी आधारित प्रणाली है जिसमें दोनों पक्ष निवेश करते हैं और लाभ-हानि साझा करते हैं।
4. इजारा (Ijara)
यह किराया प्रणाली है। बैंक किसी संपत्ति को ग्राहक को किराए पर देता है — जैसे कार लीज़ या मकान।
इन तरीकों में “रिबा” नहीं होता, बल्कि व्यापार और साझेदारी के सिद्धांतों से पैसा कमाया जाता है।
कुरआनी सिद्धांतों का अनुपालन
सऊदी अरब के बैंकिंग नियम सीधे तौर पर कुरआन और सुन्नत के आदेशों पर आधारित हैं। हर बैंक में “Shariah Supervisory Board” होता है जिसमें इस्लामी विद्वान शामिल रहते हैं। वे हर उत्पाद और लेनदेन की समीक्षा करते हैं ताकि वह हराम (Forbidden) चीजों से मुक्त हो।
हराम सेक्टरों में निवेश पर रोक है, जैसे:
शराब और ड्रग उद्योग
जुआ या लॉटरी
सूअर से संबंधित उत्पाद
सट्टा बाज़ार
इस तरह, सऊदी अरब की वित्तीय व्यवस्था न केवल आर्थिक बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी शुद्ध मानी जाती है।
आधुनिक बैंकिंग और इस्लामी सिद्धांत
सऊदी अरब ने इस्लामी सिद्धांतों को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा है। यहाँ के बैंक मोबाइल बैंकिंग, डिजिटल ट्रांज़ैक्शन, डेबिट/क्रेडिट कार्ड, ऑनलाइन निवेश जैसी सुविधाएँ देते हैं — लेकिन इन सबमें “ब्याज” नहीं होता, बल्कि “सेवा शुल्क” या “हलाल मुनाफा” लिया जाता है।
उदाहरण:
इस्लामी क्रेडिट कार्ड में ब्याज नहीं, बल्कि एक निश्चित शुल्क लिया जाता है, और ग्राहक की हर खरीदारी हलाल क्षेत्र तक सीमित रहती है।
वैश्विक प्रभाव
सऊदी अरब की इस्लामी बैंकिंग प्रणाली अब केवल अरब देशों तक सीमित नहीं रही। कई गैर-मुस्लिम देश जैसे यूके, मलेशिया, इंडोनेशिया, और भारत में भी इस्लामिक बैंकिंग मॉडल अपनाने की कोशिशें की जा रही हैं। इससे साबित होता है कि यह प्रणाली सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी स्थिर और न्यायपूर्ण है।
सऊदी अरब का बैंकिंग सिस्टम दुनिया को यह सिखाता है कि आर्थिक विकास और धार्मिक मूल्यों को साथ लेकर चला जा सकता है।
यह प्रणाली इस बात का प्रमाण है कि कुरआन के नियम न केवल आध्यात्मिक, बल्कि व्यावहारिक भी हैं।
जहाँ पूरी दुनिया ब्याज और कर्ज़ के जाल में फँसी है, वहीं सऊदी मॉडल “हलाल मुनाफे” और “साझेदारी आधारित विकास” का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
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