सूडान (Sudan) अफ्रीका का एक बड़ा और संसाधन-संपन्न देश है, जो लंबे समय से आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता, जातीय हिंसा और सैन्य संघर्ष का शिकार रहा है। 2023 से जारी ताज़ा गृहयुद्ध ने न केवल देश की अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया है, बल्कि लाखों नागरिकों को विस्थापित भी कर दिया है। यह संघर्ष सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह एक मानवीय त्रासदी बन चुकी है, जिसने पूरे अफ्रीका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को झकझोर दिया है।
सूडान का इतिहास राजनीतिक और जातीय विभाजनों से भरा हुआ है। 1956 में जब सूडान ने ब्रिटेन और मिस्र से स्वतंत्रता प्राप्त की, तभी से यह देश सत्ता संघर्ष और तानाशाही शासन का केंद्र बना हुआ है। 2005 तक देश में उत्तर और दक्षिण सूडान के बीच गृहयुद्ध चलता रहा, जिसके परिणामस्वरूप 2011 में दक्षिण सूडान अलग होकर एक स्वतंत्र देश बन गया। हलाकि, दक्षिण के अलग हो जाने के बाद भी सूडान में शांति नहीं आई। राजनीतिक सत्ता, सैन्य नियंत्रण और संसाधनों की लड़ाई जारी रही।
वर्तमान संघर्ष की शुरुआत (2023)
अप्रैल 2023 में सूडान की राजधानी खार्तूम (Khartoum) में भयंकर संघर्ष छिड़ गया। यह युद्ध सूडान की सेना (SAF - Sudanese Armed Forces) और एक अर्धसैनिक संगठन रैपिड सपोर्ट फोर्सेस (RSF) के बीच शुरू हुआ। दोनों ही गुट पहले मिलकर देश पर शासन करते थे, लेकिन जब नागरिक सरकार की बहाली की प्रक्रिया शुरू हुई, तब सत्ता को लेकर दोनों में मतभेद गहराते गए।
मुख्य व्यक्ति
जनरल अब्देल फतह अल-बुर्हान (Gen. Abdel Fattah al-Burhan) — सूडान की सेना के प्रमुख और वास्तविक राष्ट्रपति।
मोहम्मद हमदान दागलो (Mohamed Hamdan Dagalo) उर्फ़ हेमेदती — RSF के नेता।
दोनों नेताओं के बीच सत्ता बाँटने का समझौता टूट गया और यही विवाद सशस्त्र संघर्ष में बदल गया।
संघर्ष के प्रमुख कारण
1. सत्ता की लड़ाई:
दोनों सैन्य गुट देश की सत्ता और संसाधनों पर नियंत्रण चाहते हैं।
2. लोकतांत्रिक परिवर्तन का विरोध:
2021 में सेना ने नागरिक सरकार को अपदस्थ कर दिया था। जब लोकतांत्रिक शासन की बहाली की कोशिशें हुईं, तब सेना और RSF में मतभेद बढ़े।
3. जातीय और क्षेत्रीय विभाजन:
सूडान में कई जनजातियाँ और समुदाय हैं, जिनके बीच लंबे समय से असमानता और हिंसा रही है।
4. तेल और सोने के संसाधन:
सूडान अफ्रीका के सबसे बड़े सोना उत्पादक देशों में से एक है। इन संसाधनों पर नियंत्रण भी संघर्ष का कारण है।
मानवीय संकट
यह युद्ध सूडान के नागरिकों के लिए अभिशाप बन गया है। संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार, 70 लाख से अधिक लोग अपने घर छोड़ चुके हैं। हज़ारो नागरिक मारे जा चुके हैं। लाखो लोग भूख, बीमारी और हिंसा के बीच फँसे हुए हैं। खार्तूम, दारफुर और पश्चिमी सूडान में स्थिति बेहद खराब है। अस्पताल, स्कूल और बिजली की व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। महिलाएँ और बच्चे इस संघर्ष का सबसे बड़ा शिकार बन रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
संयुक्त राष्ट्र, अफ्रीकी संघ, अमेरिका, सऊदी अरब और मिस्र जैसे देशों ने युद्धविराम की कई बार अपील की, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।
कई बार “जेद्दा शांति वार्ता” (Jeddah Peace Talks) में बातचीत हुई, लेकिन दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर युद्धविराम तोड़ने के आरोप लगाए।
इसके अलावा, यूरोप और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियाँ सूडान में राहत सामग्री भेजने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन लगातार हिंसा और नाकाबंदी के कारण राहत कार्य बेहद मुश्किल हो गया है।
आर्थिक प्रभाव
युद्ध ने सूडान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से पंगु बना दिया है। बैंकिंग और व्यापारिक गतिविधियाँ ठप हैं। खाद वस्तुओं की कीमतें कई गुना बढ़ चुकी हैं। तेल और सोने के निर्यात पर असर पड़ा है, जिससे विदेशी मुद्रा की भारी कमी हो गई है। IMF और विश्व बैंक ने सूडान की आर्थिक स्थिति को “मानवता के लिए गंभीर खतरा” बताया है।
भविष्य की चुनौतियां
सूडान में शांति बहाल करना आसान नहीं है।
1. राजनीतिक समाधान तब तक संभव नहीं जब तक दोनों सैन्य गुट अपने निजी स्वार्थ छोड़कर बातचीत की राह नहीं अपनाते।
2. नागरिक शासन की बहाली — जनता चाहती है कि देश में लोकतांत्रिक सरकार बने, लेकिन सेना इसे लेकर तैयार नहीं।
3. मानवीय सहायता — युद्ध समाप्त होने के बाद भी लाखों विस्थापित लोगों को पुनर्वास की आवश्यकता होगी।
सूडान का संघर्ष केवल सत्ता या राजनीति का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक गहरी मानवीय त्रासदी है। यह संघर्ष दिखाता है कि जब किसी देश में सत्ता, सेना और लोकतंत्र के बीच संतुलन नहीं होता, तो वहाँ की जनता सबसे अधिक पीड़ित होती है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चाहिए कि वह सूडान के लिए स्थायी शांति प्रक्रिया की दिशा में ठोस कदम उठाए ताकि यह सुंदर अफ्रीकी देश फिर से स्थिरता और विकास की राह पर लौट सके।
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