ज्यादा नहीं
बस एक जनम और।
अबकी हम मिले तो ठीक वहीं से मिलें
जहाँ पेंसिल का काम ख़त्म होता है
और कलम थमा दी जाती है।
फिर हम वैसे ही मिलें,
हम आपको पसंद न करें आप हमें,
लड़ाई हो, झगड़ा हो,
आप नाराज़ हों, मैं रूठूँ…
फिर लड़ाई और नाराज़गी प्यार में बदल जाए,
ऐसी बदले कि कभी लाइफ़ में दुबारा लड़ाई ना हो।
वो आपका प्यार से रूठना,
मेरा क्लास में लेट आना
और बस मेरे इंतज़ार में
दरवाज़ा देखती रहना।
बस एक जनम और।
फिर हम साथ पढ़ें और साथ बैठें,
फिर आपका वो धीरे से मेरा हाथ पकड़ना
जैसे मेरे पूरे शरीर में बिजली दौड़ जाना,
वो सब एहसास फिर से जीना चाहता हूँ…
बस एक जनम और।
फिर हम धीरे–धीरे पत्र भेजने लगे,
आपकी पत्र का इंतज़ार करने लगे,
वो प्यार हमारा धीरे–धीरे बढ़ने लगे
इतना बढ़े कि हद पार कर जाए…
बस एक जनम और।
फिर मैं तुम्हारी पीछे वाली सीट पे बैठ के
पीछे से पैर लगाऊँ, तुम्हें सताऊँ,
तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारूँ,
उसमें से जूँ निकाले और लिखे निकालूँ
और कहूँ
“कितने किराया देते हैं ये सब?
कुछ हमें भी किराएदार बताओ,
ये लो दवा इससे नहाओ,
किराएदारों को मार भगाओ।”
और तुम गुस्से में अपनी बड़ी–बड़ी आँखें दिखाओ
और कहो
“हम मार देंगे, हमें ऐसे मत सताओ…
कडूस गांधी जी।”
बस एक जनम और।
10वीं तक आते–आते
ऐसे शर्माऊँ कि किसी भी लड़की से बात तक कर न पाऊँ,
सब क्लास की लड़कियाँ मुझे छेड़े,
मुझे सताएँ और उन्हें देखकर तुम गुस्सा दिखाओ
“ये मेरा आइटम है, अगर किसी लड़की ने इसे देखा
तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।”
ऐसा कह के तुम सबको डराओ
और मैं आपके इस अंदाज़ पे सरक जाऊँ।
फिर तुम उन लड़की पर हँसना
जो मुझसे बात करने के लिए तमाम बहाने ढूँढें,
और मैं आपकी साइकिल की चेन चढ़ाने
और आपको साइकिल सिखाने के बहाने ढूँढूँ।
बस एक जनम और।
फिर 10वीं क्लास की विदाई होगी
और जितना क्लास से बिछड़ने का ग़म होगा,
उससे ज़्यादा कठिन आपकी जुदाई होगी।
फिर हम तड़पें और परेशान हों
क्या अब हम मिल पाएँगे?
क्या फिर से एक साथ रह पाएँगे?
वो ख़त, वो स्कूल की याद,
वो दोस्त तुम और तुम्हारी लिखाई याद,
कैसे होगी विदाई…
बस एक जनम और।
फिर हो धीरे से 11 में दाख़िला
और हम तुम फिर से साथ स्कूल में हों,
फिर वही मस्ती और अपनापन हो,
तुम रहो साथ मेरे मेरी 11 की क्लास में।
फिर हम साथ पढ़ें Physics, Chemistry, Math
और क्लास में दोनों टॉप करें,
और टाइम निकाल के चुपके–से तुम हमें Bio पढ़ाओ।
बस एक जनम और।
फिर इस बार आप मेरे होठों को अपने होठों से छूना,
पकड़ के मेरा हाथ अपने हाथ में लेना
और आके इतने क़रीब कि हवा ना जाए,
फिर एक करंट मेरे और अपने शरीर में दौड़ा देना।
वो होठों से होठों के छूने का पहला एहसास
इस बार तुम कराना,
लेके अपने सुर्ख़ गुलाबी होंठ मेरे होंठों के पास लाना
और ऐसे हमें थोड़ा सताना
टच करके होंठों को फिर हटा लेना।
और गरम साँसें जब दोनों को छूएँ,
हाए वो प्यारा–सा एहसास…
कभी–कभी फिर हमें छोड़ के दूर मत जाना।
बस एक जनम और।
फिर दोनों मिल के जीवन में ऐसे मुक़ाम पे जाएँ
जहाँ सुख–चैन और पैसों की कमी ना हो।
फिर मैं आपके घर अपने मम्मी–पापा को लेकर
रिश्ता लेकर आऊँ।
फिर तुम शर्माते हुए चाय लेकर आना,
थोड़ा मुस्कुराना
और मेरे पैर पर पैर रख के मुझे सताना।
बस एक जनम और।
हम शादी में कोई कमी न छोड़ें,
सारी रसमें, सारे रीति–रिवाज
एक भी न छोड़ें।
तुम जयमाला पे हम तक न पहुँच पाओ
और हम झुक के आपके कदमों में बैठ जाएँ,
आप अपने प्यार और समर्पण भरे माला को हमें पहनाएँ
और फिर आए मेरी बारी।
हम थोड़ा–थोड़ा इतराएँ और भाव खाएँ,
आप आँख दिखा के हमें डरा देना
“अगर माला नहीं डाली तो दूँगी नहीं।”
ऐसा धमका देना।
फिर हम सबके आशीर्वाद लेकर
आधी जयमाला पूरा करें
और आपको गोद में उठाकर मैं नचा दूँ
और आप मेरे माथे पर पप्पी देकर मुस्कुरा देना।
बस एक जनम और।
फिर आएगी साथ फेरों की बारी
तो मैं सात क्या सात हज़ार वचन निभाऊँगा
और आपकी आँखों में कभी आँसू नहीं लाऊँगा।
पूरी लाइफ़ ऐसे रखूँगा
कि किसी ने ना रखा होगा।
बस आपको, आपको और आपको ही
जीवन–भर अपना लूँगा।
फिर सात जन्म क्या लाखों जन्म
आपको ही माँगूँगा
इतना प्यार दूँगा
कि तुम चाहकर भी नहीं जा पाओगी।
बस एक जनम और।
वो पहली रात जब तुम शर्माते हुए
लाल जोड़े में, मेहंदी वाले हाथों से
मेरी हथेलियों को पकड़ोगी,
और मैं धीरे से कहूँगा
“अब तुम मेरी हो… और मैं तुम्हारा हूँ,
हमेशा के लिए।”
फिर तुम घबराकर सिर झुका लो,
और मैं तुम्हारा चेहरा हाथों में लेकर उठाऊँ,
और तुम्हारी आँखों को चूमकर कहूँ
“रात अभी बहुत लंबी है,
प्यार अभी बहुत बाकी है।”
उस रात
न कोई पर्दा, न कोई दूरी,
बस दो रूहें एक–दूसरे में खो जाएँ,
जहाँ शरीर नहीं, आँखें, साँसें और दिल
एक–दूसरे को पढ़ें।
तुम मेरे सीने पर सिर रखकर सो जाओ,
और मैं पूरी रात
तुम्हारे माथे को चूमता रहूँ…
कि सपने भी तुम्हें बुरा ना कह पाएँ।
और फिर हर सुबह
तुम मेरी बाँहों में उठो
चाय की नहीं, मुझे चूमने की तलब से।
हम रोज़ अपनी बालकनी में
एक–दूसरे को बाँहों में भरकर खड़े हों,
दुनिया आए–जाए
हम परवाह न करें।
हमारा प्यार ऐसा हो
कि बारिश भी हमें देखकर शरमा जाए।
फिर हमारे घर में किलकारियाँ गूंजें,
हमारे बच्चों में
एक मेरी तरह
और एक तुम्हारी जैसी लड़की हो,
और दोनों में हमारी यही मोहब्बत उतर आए,
जैसे रूह में रूह मिलती हो।
फिर हम पूरी लाइफ़
आपके प्यार के साथ सुख से जिएँ,
बच्चों की परवरिश करें
प्यार से, संस्कार से,
और हर दिन एक नई खुशबू की तरह जिएँ।
फिर बच्चों की शादी के बाद भी
हम बेमिसाल रोमांस करें,
उम्र बढ़े पर मोहब्बत नहीं,
वो तो हर दिन बढ़ती जाए
ना शरम कम हो, ना तड़प कम हो,
ना तेरा नाम पुकारते वक़्त
दिल की धड़कनों में इज़ाफ़ा कम हो।
एक समय ऐसा आए
जब बच्चे अपने जीवन में खो जाएँ,
पर हम फिर उसी कॉलेज वाले प्यार में लौट आएँ,
वही शरारत, वही नोक–झोंक,
वही स्पर्श, वही तड़प,
वही एक दूसरे पर मर मिटने वाला रोमांस।
हम दोनों बुढ़ापे में भी
सोफ़े पर बैठकर
एक ही शॉल ओढ़ें,
और तुम्हारा हाथ मेरी उँगलियों में रहे
क्योंकि छोड़ना मानो पाप लगे।
और आख़िर में
जब ज़िंदगी बहुत लंबी चलकर
अंत की तरफ़ आए,
और तुम मेरी गोद में सिर रखकर कहो
“तुम थक तो नहीं गए…?”
तो मैं हल्की मुस्कान के साथ कहूँ
“तुम हो इसलिए पूरी दुनिया आसान है।”
और दिल आख़िरी साँस तक
एक ही दुआ माँगे
बस एक जनम और…
फिर तुम,
फिर मैं,
फिर वही प्यार
और कभी जुदाई नहीं।
इस बार जो ग़लती हुई है
वो कभी नहीं दोहराऊँगा।
तुम — अपनी जान से भी ज़्यादा चाहता हूँ,
अगले जनम तुमसे भी ज़्यादा तुम्हें चाहूँगा।
हो सके तो माफ़ करना इस जनम की ग़लती को,
अगले जनम में सब कुछ
इस जनम की ग़लती का ब्याज सहित चुका दूँगा…
बस एक जनम और…
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