माता का स्वरूप
नवरात्रि के दूसरे दिन भक्तजन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना करते हैं। यह स्वरूप माँ का अत्यंत शांत और तपस्विनी रूप है। माता के हाथों में जपमाला और कमंडल है, जो भक्ति, संयम और तपस्या का प्रतीक है। द्वितीया तिथि को व्रत करने वाले भक्त फलाहार और सात्विक आहार लेते हैं तथा गेहूँ, चावल, दाल, प्याज और लहसुन से परहेज रखते हैं। माता ब्रह्मचारिणी की उपासना करने से जीवन में धैर्य, संयम और आत्मबल की वृद्धि होती है। यह दिन साधक को तपस्या की शक्ति प्रदान करता है और परिवार में सुख-शांति व समृद्धि का संचार होता है।
व्रत विधि
- सुबह स्नान कर के स्वच्छ वस्त्र धारण करें और माँ ब्रह्मचारिणी का ध्यान करें।
- कलश और अखंड ज्योति के पास बैठकर दुर्गा सप्तशती और ब्रह्मचारिणी स्तोत्र का पाठ करें।
- उन्हें सुगंधित फूल, रोली, चावल, सिंदूर और विशेष रूप से सफेद रंग के फूल अर्पित करें।
- व्रत के दौरान संयम और शुद्ध आचरण का पालन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
क्या खाएँ?
- फल, दूध, दही, मिश्री, सूखे मेवे, मूंगफली, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा आदि खाया जा सकता है।
- सेंधा नमक का प्रयोग करें।
- घर का शुद्ध और सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।
क्या न खाएँ?
- गेहूँ और चावल
- दालें और अनाज
- प्याज और लहसुन
- सामान्य नमक
- मांसाहार और मदिरा
महत्व
माता ब्रह्मचारिणी का नाम ही ब्रह्म (ज्ञान) + चारिणी (आचरण करने वाली) से मिलकर बना है।
इनकी पूजा करने से व्यक्ति में आत्म-नियंत्रण, धैर्य और भक्ति की भावना का विकास होता है।
मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से साधक को जीवन में तपस्या और संयम की शक्ति मिलती है।
माता ब्रह्मचारिणी हमें यह सिखाती हैं कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी श्रद्धा और विश्वास बनाए रखना चाहिए।
इस दिन का व्रत करने से घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और व्यक्ति को हर कार्य में सफलता मिलती है।
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