माता का स्वरूप
तीसरे दिन की पूजा माता चंद्रघंटा को समर्पित है। उनका नाम “चंद्र” और “घंटा” से मिलकर बना है, क्योंकि उनके माथे पर अर्धचंद्र और घंटा जैसी आकृति दिखाई देती है। माता के दस हाथ हैं, जिनमें वे अस्त्र-शस्त्र और आशीर्वाद देने वाले चिन्ह धारण करती हैं। उनका वाहन सिंह है। भक्तजन इस दिन फलाहार करते हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं, जबकि गेहूँ, चावल, दाल, प्याज और लहसुन से परहेज करते हैं। माता चंद्रघंटा की उपासना से जीवन में भय का नाश, आत्मविश्वास और साहस की प्राप्ति होती है। यह दिन परिवार में सुख-शांति और समृद्धि लाता है।
माता चंद्रघंटा भय और नकारात्मक शक्तियों का नाश करती हैं। उनका स्वरूप अत्यंत सुंदर और शक्तिशाली है। देवी चंद्रघंटा अपने भक्तों में साहस, निडरता और आत्मविश्वास का संचार करती हैं।
व्रत एवं पूजन विधि
- सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- कलश स्थापना करें और माता चंद्रघंटा का ध्यान करते हुए गायत्री मंत्र या चंद्रघंटा स्तोत्र का पाठ करें।
- माता को सफेद और पीले रंग के फूल, रोली और चावल अर्पित करें।
- घर के पूजा स्थल पर दीपक और धूप जलाना आवश्यक है।
व्रत में क्या खाएँ?
- फलाहार: केले, सेब, अमरूद, संतरा आदि।
- दूध, दही और मिश्री।
- साबूदाना, सिंघाड़े का आटा और आलू या शकरकंद के हलवे/भुजिया।
- सूखे मेवे जैसे बादाम, काजू और किशमिश।
- सेंधा नमक का प्रयोग करें।
व्रत में क्या न खाएँ?
- गेहूँ, चावल, दाल, प्याज और लहसुन।
- मांसाहार और शराब पूरी तरह से वर्जित हैं।
- तीखा और मसालेदार भोजन वर्जित है।
महत्व
माता चंद्रघंटा की पूजा से भक्तों में साहस, निडरता और आत्मविश्वास का विकास होता है। यह दिन विशेष रूप से उन लोगों के लिए शुभ है जो जीवन में डर और बाधाओं से जूझ रहे हैं। उनके आशीर्वाद से शत्रु और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है।
माता चंद्रघंटा यह संदेश देती हैं कि भय और संदेह को त्याग कर, साहस और श्रद्धा के साथ जीवन में आगे बढ़ना चाहिए। इस दिन व्रत रखने से परिवार में शांति और समृद्धि आती है।
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