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author Nijamul Feb 08, 2026 7 min

Janbaaz Haider - Episode 5

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रूको उन्होंने बिना तलवार के जाने के लिये कहा है जोरावर कहता है

 

यह बात सुनकर फरहीद और वाजिद दोनो का ही अब दिमाग खराब हो चुका था

 

हैदर बिना तलवार लिये धीरे-धीरे घाटी पर चढ़ता हुआ
और गुफा के अंदर दाखिल हो चुका था

डाकुओं का सरदार :- कौन हो तुम पहले झुको मेरे सामने

हैदर तेजी से आगे बढ़ता हुआ कहता है "हैदर सिर्फ अल्लाह के आगे झुकता है"

डाकुओं का सरदार :-
मारो इसे , देख क्या रहे हो

हैदर सामने से आते हुये डकैत के तलवार को पकड़ लेता है , और जोर से कहता हुआ :- या अल्लाह , बिस्मिल्लाह
और मिलाकर एक घुसा उस डकैत के मुँह पर मारता है

गुफा के अंदर मौजूद डकैतो को उठा उठा कर एक दुसरे के उपर पटकता रहता है

हैदर मार खायें एक डकैत के हाथो से तलवार छीन लेता है 
और जैसे ही उसके हाथो में तलवार आता है मानो अब सब कुछ तबाह हो गया था 
तलवार बाजी में माहिर हैदर घाटी के सारे डकैतो से घिरा एक के बाद एक डकैतो के वार का जबाव दे रहा था

एक माहिर तलवार बाज के सामने , सारे अनाड़ी डकैत अपनी तलवारे तुड़वाकर दुम दबाकर भाग गये थे

 

बहुत देर तक हैदर को ना आता हुआ देख
खिलाफत कि फौज को लेकर फरहीद घाटी पर चढ़ाई कर देता है और दोनो गिरोहो के दरमियान संघर्ष चालु हो जाता है

डाकुओं की घाटी में पहुँच कर जोरावर ने अपना असली रंग दिखा दिया था 
जोरावर डाकुओं की फौज में मिलकर खिलाफत के फौजियों पर ही हमला कर रहा था

जोरावर हैदर और फरहीद का कत्ल कर शहजादे को लेकर भागना चाहता था और इस तरह खुद को खलीफा के सामने सबसे बेहतर साबित करना चाहता था

 

इधर घाटी में

हैदर , अपने दो भारी हाथो से डकैतो के सरदार के गिरबान को पकड़ कर कहता है 
:- बता कहाँ है शहजादे बताता है या इसी घाटी से तुझे फेंक दुँ

डाकुओं का सरदार :- नहीं नहीं मैं बताता हूँ

हैदर चिल्लाकर बता जल्दी से

डाकुओं का सरदार :- वो घाटी के पीछे जो पेड़ है मैंने शहजादे को वहाँ बाँध रखा है

हैदर यह सुनते ही उसका चेहरा गुस्से से लाल हो जाता है 
तेरी इतनी हिम्मत तुने हमारे शहजादे के साथ ऐसा किया

एक जोर का गुस्सा उसके मुँह पर मारता है कि डाकु का चेहरा खुन ही खुन में सन जाता है उसके मुँह से खुन ही खुन निकलने लगता है

हैदर दौड़ कर शहजादे के पास जाता है और उनके हाथ और पैर से रस्सी खोलता है

शहजादे रो रोककर हैदर के गले लगते है

हैदर :- घबराइये नही मैं आ गया हुँ शहजादे

इधर जोरावर और फरहीद चाचा में तलवार बाजी चल रही थी
वाजिद बुरी तरह घायल होकर जमीन के एक कोने पर पड़ा हुआ था

कुछ फौजी आकर शहजादे को सँभालते हैं और डाकुओं के सरदार को पकड़ कर रस्सी से बाँध देते हैं

फरहीद कि हालत को देख 
हैदर घाटी से चिल्लाते हुआ जोरावर के ऊपर छलांग लगाता है जोरावर उससे बचने कि कोशिश करता है मगर 
हैदर की पकड़ शेर की पकड़ जैसी थी छुटना मुश्किल था

 

दृश्य पुरी तरह स्लॉमॉशन हो जाता है

हैदर का एक जोर का मुक्का जोरावर के मुँह पर पड़ता है

जोरावर:- आहहहहहह

हैदर :- मुझे तेरी नियत पर पहले से ही शक था

हैदर जमीन पर लेटे हुये जोरावर को एक लात मारकर दूर फेंकता है

ऊठ ऊठ कहता हुआ हैदर उसके गले को पकड़ कर

जोरावर :- आआआआआआआ

हैदर एक और जोर का घुसा मारता है 
जिसने जोरावर के कानो पर ताला लगा दिया था

हैदर तलवार कि एक वार से जोरावर का एक हाथ उसके शरीर से अलग कर देता है

और उसके मुँह पर एक लात मारता हुआ कहता है
चला जा यहाँ से और कभी बगदाद शहर कि तरफ पलट कर देखना भी मत नही तो हालत और भी बुरी कर दूँगा

लड़खड़ाहटे रगड़ खाते हुये जोरावर रेगिस्तान में चला जाता है और घुम हो जाता है

 

खिलाफत के फौजियों ने अपना काम कर दिया था डकैतो के गिरोह को जड़ से मिटाकर उनके सरदार को बंदी बना लिया था

हैदर एक सिपाही को शहजादे के मिल जाने कि खबर खलीफा तक पहुँचाने के लिये उसे बगदाद भेज देता है

थके हुये फरहीद घायल वाजिद को ऊठाकर लाते हैं जिसे हैदर सँभालता है

फरहीद :- तुम दिलेरी से लड़े हो वाजिद 
हैदर वाजिद से :- तुम्हें कुछ नही होने दूँगा वाजिद बस और थोड़ा सब्र करों

 

बाजारे बंद थी शहर को फूलों से सजाया जा रहा था , दावत की तैयारी हो रही थी , महीनों बाद बगदाद शहर में खुशियाँ लौट आ रही थी

खलीफा अपने सभी वजीरों अमीरों और सिपाहसालारों के साथ अपने महल के दरवाजे पर खड़े थे

शहजादे को घोड़े मे बिठाकर घोड़े की लगाम अपने हाथों में लिये 
हैदर शहर में दाखिल हो रहा था

भीड़ हैदर जिंदाबाद के नारों से उत्साहित हो उठी थी 
हैदर पर फूलों की बरसात हो रही थी और सुगन्ध का छिड़काव हो रहा था

 

उत्साहित भीड़ , उत्साह में हैदर के नाम के नारे लगा रही थी

पीछे एक पिंजरे में बंद डाकुओं का सरदार चिल्ला रहा था

जिस पर बच्चे पत्थर फेंक फेंक कर मार रहे थे

 

हैदर के साथ फरहीद और वाजिद थे

काफिला आकर शाही महल के दरवाजे पर रूकता है
जहाँ खलीफा खलीफा अपने सभी वजीरों अमीरों और सिपाहसालारों के साथ खड़े थे

शहजादे घोड़े से उतर कर खलीफा के गले लग जाते है और दोनो ही रोने लगते है

खलीफा शहजादे से :- मेरे लख्ते जिगर मेरा बेटा अल्लाह तुझे सलामत रखे 
और उनके माथे को चुमते हैं

खलीफा हैदर को अपने पास बुलाते हुये हैदर को भी अपने गले लगा लेते हैं 
खलीफा हैदर से :- तुम नही होते तो आज मेरा बेटा मेरे पास नही होता हैदर 
मैं किस तरह तुम्हारा शुक्रिया अदा करूँ मुझे समझ नही आता है

हैदर खलीफा से :- अब बस करे हुजूर, हम बस आपके गुलाम मात्र है आपके एक हुक्म के लिये अपनी जान कि बाजी लगा देंगे

खलीफा हैदर से :- तुम बदले में हमसे वो भी तो नही लोगे जो हम तुम्हें देना चाहते है

खलिफा के दोनो हाथो को चुभता हुआ हैदर :- आप जब भी चाहे मुझे यह पद दे दे मैं आपके और शहजादे के और बगदाद शहर समेत सारी इस्लामी हुकुमत जहाँ जहाँ तक फैली है उन सभी कि हिफाज़त के लिये हमेशा तैयार हुँ

 

बगदाद के लोग हैदर को कांधे पर लेकर हैदर के नाम के नारे लगा रहे होते हैं

फरजाना भी उसी भीड़ में , मौजूद हैदर खो देख रही थी

 

खलीफा, फरहीद और वाजिद के भी कंधे को थपथपाते है
फरहीद को बहोत ही खुशनसीब बताते है कि उसके पास हैदर जैसा भतीजा है 
खलीफा फरहीद से :- हैदर के निकाह का कुछ सोचा या नही
फरहीद खलीफा से :- मैं आपसे कुछ छुपा नही सकता हुजूर 
मैंने अपनी बेटी फरजाना के लिये हैदर को मन ही मन पसंद कर रखा है 
मैं ऐसे ही किसी वक्त कि तलाश में हुँ जब वक्त आयेगा तब में उसका निकाह अपनी बेटी से कर देने का सोचता हूँ

खलीफा:- तुम बहोत देर कर रहे हो फरहीद, तुम नही जानते कि उसने एक बड़े वजीर का पद भी ठुकरा दिया है 
तुम्हे उससे अच्छा लड़का और कहीं नही मिलेगा 
मैं चाहता हुँ हैदर का तुम्हारी बेटी के साथ जल्द से जल्द निकाह हो जाये

फरहीद:- जैसा आपका हुक्म अमीर उल मोमीनीन

हैदर , घर आता हुआ जहाँ फरजाना उसका और फरहीद का इंतजार कर रही थी 
और फरजाना अपने पिता को देखकर रोने लगती है
फरहीद, रोती हुयी फरजाना को चुप कराते हैं

फरजाना :- खाना तैयार है आप दोनों हाथ मुँह धो लें मैं अभी खाना लगा देती हुँ

खाना खाते हुये फरहीद, फरजाना को अपने पास बुलाते है

हैदर और फरजाना से बेटा तुम दोनों ही अब बड़े हो चुके हो दोनो जवान हो और शादी के लायक हो

मैने मन ही मन तुम दोनों के निकाह की सोच रखी थी बस एक वक्त चाहता था बताने के लिये

फरजाना शर्माकर वहाँ से चली जाती है

हैदर :- मगर चाचा मेरे पास अभी ऐसा कुछ नही है जिससे मैं आपकी बेटी को वो सारी खुशी दे सकूँ मैं मामूली सा पहलवान ही तो हुँ

फरहीद:- बेटा मगर खलीफा का हुक्म अब में टाल नही सकता 
तुम्हे फरजाना से निकाह करना ही होगा
और तुम्हे अपना घर बनाने कि जरूरत नही तुम मेरे साथ इसी घर में रहोगे

फरजाना एक कोने से सब सुनती हुयी

हैदर :- जी ठीक है फिर मैं फरजाना से निकाह के लिये तैय्यार हुँ

 

सुबह :- बगदाद के बीच चौराहे पर

बगदाद के सारे लोग जमा हुये थे हैदर फरहीद वाजिद , खलीफा , शहजादे और बड़े बड़े वजीर अमीर , और सिपाहसालारों के साथ

डाकुओं के सरदार पर मुकदमा कर दिया गया था जिस पर काजी ने शहजादे के अपहरण के जुर्म में डाकू के सरदार का सिर कलम करने का हुक्म दिया

और यह सर कलम हैदर के हाथो से होना था

हैदर ने अल्लाह हु अकबर कहते हुये डाकुओं के सरदार का सिर्फ कलम कर दिया

और भीड़ में अल्लाह हु अकबर के नारे लगने चालु हो जाते हैं

 

और यह कहानी यहीं खत्म हो जाती है

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