कहानी की शुरुआत कुंभलगढ़ के घने जंगलों में होती है, जहाँ अमावस्या की रात सन्नाटे से भरी है।
दो शिकारी, रुद्र प्रताप सिंह और उसका साथी समर खान, एक आदमखोर बाघ की तलाश में जंगल में उतरते हैं।
रुद्र आत्मविश्वास से भरा है, जबकि समर डरता है कि बाघ कुछ अलग है।
अचानक झाड़ियों से एक बाघ हमला करता है जिसकी आँखें इंसान जैसी हैं।
समर मारा जाता है, और रुद्र घायल होकर किसी तरह भाग निकलता है।
भागते हुए वह नदी के किनारे पहुँचता है जहाँ पानी के भीतर एक हरी रोशनी से चमकता ताबीज़ दिखाई देता है।
वह ताबीज़ को छूता है और एक रहस्यमय शक्ति उसके शरीर में प्रवेश कर जाती है।
उसका शरीर बदलने लगता है, नसें चमकती हैं, चेहरा विकृत होता है और वह आधा इंसान, आधा भेड़िया बन जाता है।
रुद्र की चीख जंगल में गूँजती है और उसी रात एक शिकारी रक्षक बन जाता है।
सुबह वह एक बूढ़े आदिवासी की झोपड़ी में होश में आता है जिसने उसे बचाया था।
बूढ़ा बताता है कि जंगल ने उसे खुद बचाया है और अब उसका कोई नया मकसद है।
रुद्र शहर लौट आता है, पर महसूस करता है कि अब वह पहले जैसा नहीं रहा।
वह अपने दोस्त समर की तस्वीर के सामने खड़ा होकर अपराधबोध में डूब जाता है।
रात में उसे कुछ हथियारबंद लोग उसके घर में घुसते दिखाई देते हैं।
वह जानवर जैसी शक्ति से उन पर हमला करता है और सबको मार देता है।
हत्या के बाद वह खुद से डर जाता है, समझ नहीं पाता कि वह राक्षस है या रक्षक।
इसी बीच वैज्ञानिक डॉक्टर विशाल मल्होत्रा उसकी गतिविधियों को थर्मल कैमरों से ट्रैक कर रहा होता है।
वह समझता है कि यह वही ऊर्जा सिग्नेचर है जो कुंभलगढ़ के जंगल में मिला था।
डॉक्टर विशाल इस शक्ति को अपना वैज्ञानिक अवसर मानता है और कुंभलगढ़ जाने की तैयारी करता है।
रुद्र भी सच्चाई जानने के लिए जंगल लौटता है, जहाँ से उसकी कहानी शुरू हुई थी।
वह फिर उसी नदी के किनारे पहुँचता है और ताबीज़ को पुकारता है।
तब एक आत्मिक आकृति प्रकट होती है जो उसे बताती है कि वह किसी श्राप या गलती का नहीं, बल्कि संतुलन का प्रतीक है।
वह जानता है कि जिस बाघ को उसने मारा था, वह असल में एक मानव था जिस पर जीन-परिवर्तन का प्रयोग हुआ था।
वो प्रयोग डॉक्टर विशाल ने किया था, जिसने मानव और जानवर का मिश्रण बनाया था।
रुद्र को एहसास होता है कि वह उसी प्रयोग का सुधार है — एक संतुलित रूप।
वह ताबीज़ को स्वीकार करता है और जंगल की शक्ति का संरक्षक बन जाता है।
डॉक्टर विशाल अपनी टीम और सैनिकों के साथ कुंभलगढ़ पहुँचता है ताकि रुद्र को पकड़ सके।
रुद्र जंगल की शक्ति से सैनिकों पर हमला करता है और अपने वातावरण को हथियार की तरह इस्तेमाल करता है।
डॉक्टर विशाल गैस और मशीनों का उपयोग कर जंगल को नियंत्रित करने की कोशिश करता है।
रुद्र पेड़ों, हवा और मिट्टी से शक्ति लेकर लड़ता है और कई सैनिकों को निष्क्रिय कर देता है।
लेकिन ट्रैंक्विलाइज़र की गोली उसे कमजोर कर देती है और वह गिर जाता है।
विशाल उसे पकड़कर लैब में ले आता है और पारदर्शी टैंक में बंद कर देता है।
वह कहता है कि अब रुद्र उसका प्रयोग है और वह उसकी शक्ति को नियंत्रित करेगा।
रुद्र विरोध करता है पर इंजेक्शन से बेहोश कर दिया जाता है।
जब वह जागता है तो अपने भीतर की ऊर्जा को महसूस करता है और लैब की मशीनें असामान्य व्यवहार करने लगती हैं।
बिजली गिरती है, सिस्टम ओवरलोड होता है, और जंगल की ऊर्जा लैब तक पहुँच जाती है।
टैंक का काँच टूट जाता है और रुद्र मुक्त हो जाता है।
उसकी देह से हरी ऊर्जा फैलती है और गोलियाँ बेअसर हो जाती हैं।
डॉक्टर विशाल डर जाता है लेकिन कहता है कि उसने रुद्र को बनाया है।
रुद्र जवाब देता है कि वह प्रकृति की गलती नहीं बल्कि उसका संतुलन है।
विशाल खुद पर वही इंजेक्शन लगाता है ताकि वह भी रुद्र जैसी शक्ति पा सके।
उसका शरीर विकृत हो जाता है और वह एक विकराल प्राणी बन जाता है।
दोनों के बीच भयानक युद्ध होता है — विज्ञान और प्रकृति का टकराव।
विशाल हिंसा और लालच से भरा है, जबकि रुद्र संयम और संतुलन से।
अंत में रुद्र अपनी सारी ऊर्जा केंद्रित कर विशाल को नष्ट कर देता है।
लैब जलकर राख हो जाती है और रुद्र जंगल से बाहर निकलता है।
बारिश गिर रही है और हर पेड़ जैसे उसे प्रणाम कर रहा हो।
वह ताबीज़ उठाता है और गले में पहन लेता है, अब उसकी आँखों में शांति होती है।
वह जंगल का प्रहरी बन जाता है — न इंसान, न जानवर, बल्कि वृक्षक।
वह कसम खाता है कि जब तक वह जिंदा है, कोई भी जंगल को नुकसान नहीं पहुँचा सकेगा।
कुछ समय बाद शहर में डॉक्टर विशाल के गायब होने की चर्चा होती है।
लोग कहते हैं कि वह कुंभलगढ़ में लापता हो गया।
लेकिन हर अमावस्या की रात पहाड़ियों से एक दहाड़ सुनाई देती है।
वह दहाड़ कभी इंसान जैसी, कभी भेड़िए जैसी होती है।
लोग जानते हैं कि वह आवाज़ वृक्षक की है — जो अब प्रकृति का रक्षक है।
Blog Comments (0)