बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
डिस्क्लेमर :-
यह कहानी सुल्तान महमूद गजनवी रहमतुल्लाह अलैह गाजी कि जिंदगी पर लिखी गयी है
इस लेख से जुड़ी जानकारीयाँ विकिपीडिया और इतिहास कि किताबों समेट सोशल मीडिया से लिये गये हैं , इस कहानी को बयान करने का थीम लेखक का अपना विचार है , इस कहानी का सिर्फोसीर्फ मकसद मुसलमानों को उनके सुनहरे तारिख से रूबरू कराना है , यह कहानी इसके अलावा और किसी मकसद के लिए नहीं लिखा गया है
बराहे करम अपने सवाबदीद पर अमल करें , शुक्रिया
गजनी के तुर्क साम्राज्य का इतिहास और ताकत को जानने के लिये उस सामानी साम्राज्य का इतिहास जानना बड़ा जरूरी है जिसके छत्रछाया में इस सल्तनत का विकास हुआ
सामानी साम्राज्य का संस्थापक असद इब्न समन एक सरदार था जो पहले जरथ्रुष्टी फिर बाद में इस्लाम कबूल कर मुसलमान हो गया
इसके चार बेटे थे नूह , अहमद , याह्या और इलियास
इन चार भाइयों ने सामानी राज्य की स्थापना में प्रमुख भूमिका अदा की।उनमें से प्रत्येक ने अब्बासिद आधिपत्य के अधीन क्षेत्र पर शासन किया।
इन चारों भाईयों में अहमद बड़ा दिलेर और साहसी था , इसने समरकंद बुखारा पर अधिकार जमा लिया
अहमद का बेटा नस्र और पौता इस्माइल ने एक शासक के अधीन सामानी सल्तनत को एकजुट किया, इस प्रकार सामानी द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली सामंती व्यवस्था को प्रभावी ढंग से समाप्त कर दिया। यह उसके अधीन भी था कि सामानी , अब्बासिद अधिकार से स्वतंत्र हो गए।
इस्माइल सामानी वंश का प्रसिद्ध राजा था जिसे "अमीर" का लकब हासिल हुआ
बाद में छोटे छोटे जागीरदारों को भी यह लकब हासिल होने लगा
इस्माइल का बेटा "अहमद इब्न इस्माइल" था और
अहमद इब्न इस्माइल का बेटा नस्र द्वितीय था
इस सईद नस्र द्वितीय के राज्यकाल में याकुब इलेस नाम के साहसी और उपद्रवी कसेरा जाति के वीर ने
एक बर्बर जमाव कि सहायता से हिंदुस्तान पर हमला किया
इसने पहले हेरात ले लिया , यह बात जान लेना जरूरी है कि उस समय आज का अफ्गानिस्तान भी हिंदुस्तान में शामिल था
हिंदुस्तान के सिंधु पश्चिम प्रांत के दो हिस्से थे एक काबुलिस्तान तो दुसरा जाबुलिस्तान
काबुल में उस वक्त लाल्लिय का शाही ब्राह्मण वंश शासन कर रहा था और जाबुल मे भाटी जाति के क्षत्रिय वंश का शासन था
याकुब इलेस ने काबुल और जाबुल दोनो को जीत लिया
काबुल का किला भी मुसलमानों के हाथो में आ गया फिर यह कभी भी हिंदुओ के पास नही गया
जबकि काबुल फिर शाही राजा के नियंत्रण में आया मगर इन्हें अपनी राजधानी सिंध के पश्चिम में उदभांड में स्थापित की
याकुब इलेस ने गजनी नाम के एक गांव इलाके में एक किला बनाकर वैभव सम्पन्न नींव रखी उसने आसपास के सब इलाकों को जीत लिया और फिर वहाँ से राजपूतों को पुर्व की और भगा दिया
भाटी राजपुत सिंधु नदी पार करके पंजाब में आ बसे
याकुब इलेस में रचनात्मक शक्ति नही थी वो ना तो सामानी साम्राज्य का अंत कर सका और ना ही गजनी में नया साम्राज्य कायम कर सका
नस्र द्वितीय के बेटे नुह को अमीर हमीद कहा जाता था
इसी के समय तुर्की गुलाम सेवा में रहकर प्रबल होने लगे , तुर्की बच्चे गुलामों कि तरह खरीदे जाते थे इनमें कई वीर साहसी तुर्की सेना में बड़े पदों पर नियुक्त थे , सामानी राजाओं ने इन तुर्की गुलामों को अपना अंग रक्षक बना रखा था
नुह के बाद उसका बेटा अब्द अल-मलिक इब्न नुह
तख्त पर बैठा और इसके बाद अबू सलीह मंसूर इब्न नुह तख्त पर बैठा
मंसुर के राज्य काल में ही बलिष्ठ तुर्क सरदार छोटे छोटे स्वतंत्र राज्य स्थापित करने लगे
अब्दुल मलिक का हाजिब( द्वारपाल )अल्पतगीन तुर्क था इसने भी गजनी में एक छोटा राज्य स्थापित किया
इसका गुलाम "सबकतगीन" भी कुछ वक्त के लिये सामानी साम्राज्य का प्रतिहार रह चुका था
मन्सूर के बाद नुह द्वितीय ने कुछ वक्त के लिये हुकुमत कि थी
इसके बाद ही अलपगतीन की मौत हो गयी और फिर तुर्क सरदारों ने सबकतगीन को सरदार बना दिया
सबकतगीन बड़ा ही साहसी और न्याय प्यारा सरदार था नुह द्वितीय ने भी इसकी व्यवस्था मान ली
जब काशगर के बादशाह इलेख खाँ ने बुखारा पर हमला किया तब नुह द्वितीय ने सबकतगीन से मदद माँगी , अपने बादशाह नुह द्वितीय कि मदद के लिये सबकतगीन एक भारी बड़ी फौज लेकर पहुँचा
इस जंग में सबकतगीन का बेटा महमूद भी मौजूद था
जिसने जंग के मैदान में लड़ने का पहला हुनर यहीं से सिखा
( ऊपर दी गयी जानकारी " हिंदु भारत का अंत " नामी पुस्तक से लिया गया है और इसके अलावा विकिपीडिया से भी लिया गया है )
जगह :- बुखारा का एक खुला मैदान
जंग के मैदान में एक लम्बा चौड़ा कद काठी का नौजवान तलवार की महारत दिखाता हुआ दुश्मन फौजियो के छक्के छुड़ा रहा था
दुश्मन फौजियों के तलवार के हर वार को अपनी तलवार बाजी के महारत और कला से एक के बाद
जबाव दे रहा था
और सिर्फ तलावार बाजी की महारत से ही नहीं बल्कि अपने बाजुओ के जोर से भी वो मैदान में अपनी ताकत दिखा रहा था
दुश्मन फौज का एक फौजी नफरत भरे अंदाज से उस नौजवान की तरफ दौड़ता हुआ आता है तभी उसके सामने से आते हुआ घुड़सवार उसके सीने पर तलवार से उसका सीना चिर देता है और वो दुश्मन फौजी जमीन में जा गिरता है
यह घुड़सवार सबकतगीन थे
सबकतगिन अपने घोड़े में बैठकर :- महमूद बचो
महमूद पिछे देखते हैं और तलवार से उसके पीछे से आते हुए दुश्मन फौजी के सिने के आर पार कर देते हैं
सबकतगीन :- शाबाश! बेटे , अब तुम माहिर बनते जा रहे हो
बेटा बस हौसला मत हारना ऐसे ही लड़ते रहो मैं तुम्हारे भाई इस्माइल कि फौज कि कयादत के लिये जा रहा हुँ
महमूद :- जी
सामानी साम्राज्य पर काशगर के सुल्तान इलेख खाँ ने हमला किया था जिसका जोरदार जबाव सामानी सुल्तान की और से उनके खाश सिपाहसालार सबकतगीन ने दिया था
इलेख खाँ कि फौज नाकाम रही और इलेख खाँ को पीछे हटना पड़ा
सामानी साम्राज्य के राजदरबार में आज जीत कि खुशी कि दावत थी
जिसमें सामानी साम्राज्य के बड़े बड़े वजीर और सिपाहसालार मौजूद थे
सामानी साम्राज्य के सुल्तान नुह द्वितीय:-
हम तुम्हारे और तुम्हारे बेटे की बहादुरी से बड़े खुश हुए सबकतगिन , तुम नहीं होते तो इलेख खाँ हमारी सल्तनत को तबाह कर देता तुम्हारी फ़ौज ने जैसे इलेख खाँ कि फौज को उखाड़ फेंका और वो जंग के मैदान से भागने के लिए मजबूर हो गया , सबकतगिन यहाँ आओ और मेरे गले लग जाओ
और तुम्हारा ये बेटा महमूद मेरी दुआ है की यह तुमसे बड़ा सरदार बने
सबकतगीन:- शुक्रिया मेरे सुल्तान
आज मैं तुम्हें सबकतगीन नसीरुद्दौला और तुम्हारे बेटे महमूद को सैफुद्दौला के खिताब से नवाजता हुँ
कहानी जारी है ........................
Blog Comments (0)