बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
डिस्क्लेमर :-
यह कहानी पुरी तरह से मुहम्मद बिन क़ासिम रहमतुल्लाह अलैह के निजी जिंदगी को बयान नही करती है
इस लेख से जुड़ी जानकारीयाँ विकिपीडिया से लिये गये हैं और इस कहानी को बयान करने का थीम लेखक का अपना विचार है
इस कहानी का सिर्फोसीर्फ मकसद मुसलमानों के दरमियान उनके सुनहरे तारिख से रूबरू कराना है
यह कहानी इसके अलावा और किसी मकसद के लिए नहीं लिखा गया है
बराहे करम अपने सवाबदीद पर अमल करें
सन् 696
जगह :- सिंध
राजा दाहीर का राज दरबार
राजा दाहिर अपने सिन्हासन पर बैठा हुआ है बड़ा ही गुस्से से वो अपने सामने मौजूद दो हिंदू ज्योतिषो को देखता है ये ज्योतिष हाथ में कुछ नक्षत्र कि किताबे लिए डरे डरे से खड़े रहते हैं
राजा दाहिर (चिल्लाते हुए) :- अरे बोलेंगे भी क्या ऐसे ही खड़े रहेंगे क्या होने वाला है, ऐसी क्या विपदा मुझपर टूटेगी जो तुम लोगो से बोला भी नही जा रहा है
एक ज्योतिष :- महाराज महाराज वो बात ऐसी है की आपके जान को खतरा है और आपके सिन्हासन का तख्ता पलट करीब ही है
राजा दाहिर बड़ी आँखों से गुस्से में देखते हुये :- क्या ?
दुसरा ज्योतिष :- जी महाराज यही वो बात है जो हमसे बोला भी नहीं जा रहा था
राजा दाहिर :- अच्छा तो कौन है वो जो मुझ जैसे प्राक्रमी राजा के विरुद्ध खड़ा होगा क्या इस बारे में कुछ जानते हो
ज्योतिष :- नहीं महाराज हमें बस इतना ही पता है की संकट का समय निकट ही है जल्दी से आप अपनी सेना को मजबूत करे आपके शत्रु आपके बहुत ही निकट होने को है
राजा दाहिर :- अपने सिन्हासन से उठकर अपनी बाहों को फैलाकर जोर से चिल्लाता हुआ आहह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह
जगह :- ताईफ़, अरब
फ़ज़्र की अजान होने को ही था कासिम बिन युसूफ के महल के एक कमरे में एक बच्चे की रोने की आवाज ये बच्चा फिलहाल ही पैदा हुआ था और मस्जिद से अल्लाह हु अकबर की आवाज गुंज उठी
फज्र की नमाज के बाद कासिम बिन यूसुफ ने दुआ कि ए मेरे रब तेरी रहमत से मुझे एक औलाद हुआ है मैं चाहता हूं उसका नाम मुहम्मद रखू जो तेरे नेक बंदों में हो और तेरे राह में जिहाद को आमादा रहे तेरे दीन इस्लाम को सहरा की वादियो से दूर दूर तक बिखेरे और तेरे रसूल हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहुअलैहिवसल्लम के गुलामो में आले दर्जे पर उसका नाम हो मेरी दुआ कबूल कर आमीन
दावत का दिन
कासिम बिन युसूफ के महल में आज खुशी का दिन था उन्होंने अपने बच्चे कि पैदाइस कि खुशी में दावत रखा था उनके घर मेहमान आ रहे थे उनके करीबी नाना प्रकार के हदिया ले कर आये थे तभी उनके महल के दरवाजे पर कुछ फौजियों का दस्ता ठहरता है जो हज्जाज बिन युसूफ की तरफ से भेजा गया दस्ता था जो कासिम बिन युसूफ के बड़े भाई थे
हज्जाज बिन युसुफ़ जो उमैय्यद खलीफा कि तरफ से इराक़ के राज्यपाल नियुक्त किये गये थे
अपने भतीजे कि पैदा होने कि खुशी में तरह तरह कि मिठाईयाँ पकवान खुबसुरत लिबास एक फौजी दस्ता के हाथों भेजे थे
एक फौजी :- अस्सलामु अलैकुम ब रहमतुल्लाही ब बरकताहु
युसुफ:- वा अलैकुम स्सलाम ब रहमतुल्लाही ब बरकताहु
फौजी :- यह फौजी दस्ता आपके बड़े भाई आली जनाब हज्जाज बिन युसुफ कि तरफ से भेजा गया है
उन्होंने आपके बच्चे कि पैदाइश कि खुशी में आपके लिये तरह तरह का हदिया भेजा है
कबूल फरमायें
कासिम बिन युसुफ :- आप लोगों का शुक्रिया भाईयों
मेरी तरफ से मेरे बड़े भाई को मेरा सलाम और इन खूबसूरत तोहफों के लिये शुक्रिया कहना
फौजी :- जी , हम ऐसा ही कहेंगे
5 से 6 साल बीत चूका था कासिम अपने बच्चे के साथ बागानों में घुमते खेलते और कासिम अपने बच्चे को हमेशा अपने साथ रखते हैं जिस कारण से मुहम्मद बिन कासिम अपनी माँ के मुकाबले कासिम बिन युसुफ से ज्यादा लगाव रखते थे
एक दिन कासिम बीमार पड़ गए उन्हे बहुत तेज सर दर्द होने लगा साथ बुखार भी होता
हकीम साहब तरह तरह की जड़ी बुटियों के काड़े कासिम के लिए बनाते मगर ये सब कासिम की बिमारी का इलाज नहीं कर पा रहे थे और इलाज के लिये बेअसर रहते
कासिम बिस्तर में सोए हुए अपने बच्चे से बात करते हैं
कासिम :- बेटा मुहम्मद इधर आओ इधर आओ मुहम्मद बिन कासिम की मां उन्हे कासिम के पास लेकर जाती है
मुहम्मद बिन कासिम :- जी अब्बू जान
कासिम :- बेटा मेरी बात सुनो
मुहम्मद बिन क़ासिम :- जी अब्बू कहें
कासिम बिन युसुफ :- बेटा मैं तुम्हें एक जिम्मेदारी देना चाहता हुँ तुम्हें ये जिम्मेदारी संभालनी है वादा करो के तुम एक फौजी बनोगे एक मुजाहिद बनोगे एक ऐसा मुजाहिद जो अल्लाह के दीन के लिए काफिरो से मुसलसल जिहाद करता रहे वादा करो वादा करो बेटा
मुहम्मद बिन कासिम:- जी अब्बू जान में वादा करता हूं में मुजाहिद बनुगा जो खुदा के दीन के लिए काफिरो से जिहाद करता रहेगा
कासिम बिन युसुफ अपनी अखिरी साँस लेते हैं एक खामोशी के साथ घर मातम में बदल जाता है कासिम की बीवी समेत महल की सारी गुलाम औरते रोना शूरू कर देती हैं मुहम्मद बिन कासिम अपने अब्बू के बदन से लिपट कर रो रहे होते हैं कासिम बिन युसुफ की नमाजे जनाजा के बाद सकीफ कबीले के लोग उनको दफनाने के लिये ले जाते हैं
मुहम्मद बिन क़ासिम एक कोने से सब देख रहे थे तभी उनके पीछे एक मजबूत और भारी हाथ उनके कंधे में उन्हे महसूस होता है वो पिछे मुड़ कर देखते हैं ये हज्जाज बिन युसूफ थे कासिम बिन युसुफ के भड़े भाई और मुहम्मद बिन कासिम के तायाअब्बा और साथ ही साथ उम्मैयद खिलाफत के इराक सूबे के राज्यपाल भी थे
कहानी जारी है............................
Blog Comments (2)
Nijamul
28/01/2026माशाअल्लाह शानदार
Nijamul
28/01/2026माशाअल्लाह शानदार