बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
डिस्क्लेमर :-
यह कहानी मुहम्मद बिन क़ासिम रहमतुल्लाह अलैह
गाजी कि जिंदगी पर लिखी गयी है
इस लेख से जुड़ी जानकारीयाँ विकिपीडिया से लिये गये हैं और इस कहानी को बयान करने का थीम लेखक का अपना विचार है
इस कहानी का सिर्फोसीर्फ मकसद मुसलमानों के दरमियान उनके सुनहरे तारिख से रूबरू कराना है
यह कहानी इसके अलावा और किसी मकसद के लिए नहीं लिखा गया है
बराहे करम अपने सवाबदीद पर अमल करें
दुसरे एपिसोड में आपने पढ़ा कि हज्जाज बिन युसुफ, मुहम्मद बिन कासिम को लेकर बगदाद शहर अपने घर पहुँचते हैं
और उनकी परवरिश अपने बच्चों कि तरह करते हैं
उन्हें तलवार बाजी और तीरंदाजी के हुनर सीखाते है
इधर स्वार्थी और अहंकारी राजा दाहीर अपनी प्रजा पर अनेक तरह के कर लगा देता है जिससे उसकी प्रजा उसकी बागी बन जाती है
आगे..............
मुहम्मद बिन कासिम अब जवान हो चुके थे करिब 15 साल के तलवार बाजी और तीरंदाजी में माहिर बेहतरीन घुड़सवार
वही सल्तन्त के छोटे मोटे झड़पो में भी कई बार हिस्सा ले चुके थे यानि वो एक तरह से अब जंग में भी माहिर होते जा रहे थे
इन्हीं छोटी झड़पो में फतेह हासिल करके आते हुए
मुहम्मद बिन कासिम :- ताया जान , मैं आ गया
हज्जाज बिन युसूफ :- देखो आ गया मेरा भतीजा तुम पर अल्लाह की सलामती हो बेटा
मुहम्मद बिन क़ासिम :- आप पर भी अल्लाह की सलामती हो ताया जान
हज्जाज बिन युसुफ :- कैसा रहा ये ऐहतेजाज , बेटा ?
मुहम्मद बिन कासिम :- अल्लाह की रहमत से फतेह हासिल हुई है विद्रोहीयों की बुरी तरह हार , इस्लाम का परचम बुलंद हुआ है
हज्जाज बिन युसुफ :- मुझे यकीन था तुम अपने इस महाज में कामयाब होंगे अल्लाह तुम्हें इसी तरह फतेह देता रहे
और मेरी औलादे कहाँ है ?
मुहम्मद बिन कासिम :- जी उन्होने भी दिलेरी से सामना किया हर वक्त वो चौकन्ना रहे और मुस्तेदी के साथ विद्रोहियों का सामना किया
हज्जाज बिन युसुफ अपनी बीवी के साथ
हज्जाज कि बीवी :- क्या सोच रहे हैं आप
हज्जाज बिन युसुफ :- मेरे इतने बेटे हैं मगर कोई कासिम जैसा नहीं
हज्जाज कि बीवी :- कासिम आपके भाई का बेटा है वो हमारे बेटो की जगह नहीं ले सकता
हज्जाज बिन युसुफ :- हाँ जानता हूँ मगर अब मैं उसे अपना बेटा और करीबी बनाना चाहता हूं
हज्जाज कि बीवी :- जी कैसे ?
हज्जाज बिन युसुफ :- मैं कासिम का निकाह जुबैदाह से करना चाहता हूं
हज्जाज कि बीवी :- जुबैदाह ?
हज्जाज बिन युसुफ :- हाँ दोनो बच्चे ही अब जवान हो चुके हैं और ये फैसला बिल्कुल ठीक है
मैं मुहम्मद बिन क़ासिम से इस पर बात करुँगा
हज्जाज कि बीवी:- जी ठीक, यही मेरा भी फैसला है
मुहम्मद बिन क़ासिम अपनी तलवार से अभ्यास कर रहे थे, तभी हज्जाज बिन युसुफ वहाँ आते हैं
हज्जाज :- कासिम, मुझे तुमसे बात करनी है अभी कासिम :- जी ताया अब्बू कहें
हज्जाज:- यहाँ नहीं बेटा तन्हाई में
कासिम :- जी
मुहम्मद बिन कासिम अपने सिपाहीयों को वहाँ से जाने का इशारा करते हैं
हज्जाज बिन युसुफ ( मुहम्मद बिन क़ासिम की तरफ देखते हुए) :- बेटा तुम अब बड़े हो चुके हो और मुझे तुम्हारी निकाह की फ़िक्र है इसलिये मैने ये फैसला लिया है कि तुम्हारा निकाह जल्द ही जुबैदा के साथ पड़वा दिया जाए तो अच्छा होगा
मुहम्मद बिन कासिम :- जी ताया अब्बू मुझे आपका हर फैसला मंजुर है
हज्जाज बिन युसुफ :- बेटा मैं जानता हूं तुम मेरे किसी फैसले को मना नही करोगे मगर ये तुम्हारे जिंदगी का एक बड़ा फैसला है
मुहम्मद बिन कासिम :- ताया अब्बू मुझे जुबैदाह से निकाह में कोई परेशानी नहीं है हम साथ में बड़े हुए हैं और एक दुसरे को समझते भी हैं मै जुबैदाह से निकाह के लिए तैयार हुँ
हज्जाज बिन युसुफ , मुहम्मद बिन कासिम को देख कर गले लगा लेते हैं
जुबैदाह और हज्जाज की बीवी कमरे में
हज्जाज की बीवी :- तुम्हारा निकाह मुहम्मद बिन कासिम से तय किया गया है
जुबैदाह :- मुहम्मद बिन कासिम भाई ?
हज्जाज की बीवी:- तुम्हारे अब्बू ने ये फैसला लिया है, मगर में तुम्हारा फैसला जानना चाहती हूं जुबैदाह:- अगर फैसला अब्बू ने लिया हैं तो मैं उनके फैसले को कैसे ठुकरा सकती हूं
हज्जाज की बीवी: मुझे तुमसे यहीं उम्मीद थी मेरी बच्ची में जानती हूं कासिम तुम्हारे लिए ठीक हैं तुम एक साथ बड़े हुए हो और मुहम्मद बिन कासिम बहुत ही बेहतरीन जंगजू है बिल्कुल तुम्हारे अब्बू की तरह
जुबैदाह अपने कमरे से बाहर की तरफ निकलती है, कासिम भी सामने से आ रहे होते हैं जुबैदाह , मुहम्मद बिन कासिम को देखकर शर्मा जाती है और उन्हें देखकर पीठ फेर लेती है
मुहम्मद बिन क़ासिम जुबैदाह से निकाह को लेकर बात करना चाहते थे इसलिये मुहम्मद बिन कासिम , जुबैदाह को आवाज देते हैं
मुहम्मद बिन क़ासिम :- जुबैदाह ......
जुबैदाह :- वही रुक जाती है कासिम उनकी तरफ़ आते हैं
मुहम्मद बिन कासिम :- जुबैदाह में तुमसे बात करना चाहता हूँ
दोनो एक दुसरे से सही से नजर नहीं मिला पा रहे थे
हालांकी दोनो पहले भी कई बार एक दुसरे से मिल चुके थे मगर ये फीलिंग उन दोनो के लिए पहली बार थी दोनो पहली बार एक दुसरे के लिए कुछ अलग सा महसूस कर रहे थे
मुहम्मद बिन क़ासिम :- क्या तुम निकाह से सहमत हो
जुबैदाह (नजर जुकाये हुये ) :- मुझे अब्बू का फैसला मंजूर है में उनके खिलाफ नहीं जा सकती
मुहम्मद बिन क़ासिम :- बिल्कुल मैं भी , इस फैसले के खिलाफ नहीं जा सकता
हज्जाज बिन यूसुफ, अपनी बेटी का निकाह मुहम्मद बिन कासिम से कर देते हैं
मुहम्मद बिन कासिम के पिता की दुआ अब पूरी हो रही थी मुहम्मद बिन कासिम ने एक ऐहतेजाज में शिराज को जीत लिया था और इसके बाद खिलाफत में उनके बहादुरी के किस्से मशहुर होने लगे थे
इतने कम उम्र में ये बहुत बड़ा करनामा था जिससे खुश होकर खलीफा अल-वलीद प्रथम की तरफ से
मुहम्मद बिन कासिम को वहाँ का गवर्नर मुंतखिब कर दिया गया था
कहानी जारी है ....................
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