बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
डिस्क्लेमर :-
यह कहानी मुहम्मद बिन क़ासिम रहमतुल्लाह अलैह
गाजी कि जिंदगी पर लिखी गयी है
इस लेख से जुड़ी जानकारीयाँ विकिपीडिया से लिये गये हैं और इस कहानी को बयान करने का थीम लेखक का अपना विचार है
इस कहानी का सिर्फोसीर्फ मकसद मुसलमानों के दरमियान उनके सुनहरे तारिख से रूबरू कराना है
यह कहानी इसके अलावा और किसी मकसद के लिए नहीं लिखा गया है
बराहे करम अपने सवाबदीद पर अमल करें
पाँचवें एपिसोड में आपने पढ़ा कि मुहम्मद बिन क़ासिम, को मकरान के राज्यपाल से फौजी मदद हासिल होती हैं और इसके बाद उन्हे एक विद्रोह को भी कुचलना पड़ता है
जिसके बाद सिंध के देबल बंदरगाह और दो प्रमुख शहरों को जितते हुये सिंध कि राजधानी रोहड़ के करीब ही अपना पड़ाव डालते हैं
अब आगे..........................
जगह - रोहड़ (सिंध कि राजधानी)
दृश्य - सिंध का राज महल
वक्त - सुबह सुबह
राजा दाहिर अपने बिस्तर में सो रहा था
उसका मंत्री चिल्लाता हुआ :- महाराज महाराज उठिये
दाहिर (कच्ची निंद से जागता हुआ) :- क्या हुआ मुर्ख इतने सुबह सुबह चिल्ला क्यों रहा है
मंत्री :- अनर्थ हो गया महाराज अनर्थ हो गया महाराज
दाहिर :- क्या अनर्थ हुआ है
मंत्री :- सरकार देबल बंदरगाह पुरी तरह से लूट लिया गया है लुट लिया गया है महाराज
दाहिर :- किसकी इतनी हिम्मत हो गयी
मंत्री :- महाराज मुहम्मद बिन कासिम नाम का उम्मैयद खिलाफत का एक सिपाहसालार जिसके बहादुरी के किस्से सारी सल्तन्तो रियासतो साम्राज्यों में कबकी फैल चुकी है
दाहिर :- मुहम्मद ......... बिन ... कासिम आह्ह्ह्हहहहहहहहहह
दाहिर :- जल्द से राजसभा बुलाई जाए मेरे खास मंत्रियो को इकठ्ठा करो , सरहदों में फौजी पैनी नजर बिछा दो मुहम्मद बिन कासिम किसी भी तरह से और आगे ना बढ़ पाये
मत्री :- जी महाराज जी महाराज
दाहिर:- जल्दी जाओ.........
देवल बंदरगाह को जितने के बाद सिंधु नदी के किनारे राजधानी रोहड़ पर हमले कि ताक में मुहम्मद बिन कासिम ने अपने फौजी छावनी वहीं डाल दिये
इन्हीं तंबूओ में एक में मुहम्मद बिन क़ासिम अपने सिपाहसालारों के साथ बैठकर रोहड़ पर हमले की योजना करते हुए हुए
एक सिपहसलार :- ये रहा रोहड़ हुजूर और हम अभी करीब यहाँ बैठे हुए हैं इस रोहड़ की हिफाजत के लिए दाहिर सेन ने कमसकम 50 हजार से एक लाख की मजबूत फौज तैय्यार कि है जबकी खुले मैदान में हमारे पास मात्र 15 हजार पैदल फौजी और 1000 घुड़सावर और 300 हाथी फौज है
मुहम्मद बिन कासिम :- हम ज्यादा दिन इंतजार नहीं कर सकते हैं हम हमला करेंगे जल्द से जल्द
एक सिपाह सालार ( बाहार से अंदर की तरफ आता हुआ ) :- हुजूर सिंध के कुछ आवाम आप से मुखातिब होना चाहते हैं
मुहम्मद बिन कासिम :- ठीक है उन्हे अंदर आने दिया आजे
मुहम्मद बिन कासिम (एक सिंधी किसान से मुखातिब होते हुए) :- कहिये क्या कहना है आपको
वो सिंधी :- हुजूर हम तबाह हो रहे हैं हम बरबाद हो रहे हैं हुजुर , राजा दाहिर हमारा दुश्मन है हम पर ज्यादा से ज्यादा कर लगाकर हमें गरीबी में ढकेल चुका है आप हमें बचा लीजिये सरकार
मुहम्मद बिन कासिम :- मैं दाहिर को हराने ही यहाँ आया हूँ
सिंधी:- जी हम भी यही चाहते हैं कि आप उस जिद्दी और अनाड़ी राजा को हराकर उसका तख्तापलट करे और उसके लिए हम आपकी मदद करेंगे अपनी जान भी दे देंगे हुजुर
मुहम्मद बिन कासिम (ने एक नज़र सभी को देखा) :- बहुत खूब बहुत आला
और सिर हिलाकर :- ठीक है
जगह :- सिंध का राज दरबार
सारे दरबार में शांति थी सब मंत्रीजन सर झुकाये एक दुसरे को देख रहे थे
दाहिर :- आखिर आज वो विपत्ति मेरे सामने मेरी मौत बनकर खड़ी है और मैं कुछ नहीं कर पा रहा हुँ मेरी फौज जैसे मेरी ही दुश्मन बन चुकी है देबल बंदरगाह और वो दो शहरे जितना इतना आसान नहीं था मगर मुहम्मद बिन कासिम की छोटी सी फौज ने सब कुछ तबाह कर दिया देबल बंदरगाह का हमसे छीन जाना हमें आर्थिक तौर पर बहुत नुकसान पहुँचा चुका है
एक मंत्री :- महाराज जो हो गया वो हो गया अब आगे करना क्या है ये सोचे , मुहम्मद बिन कासिम रोहड़ के करीब सिंधु नदी के किनारे ही अपनी छावनी लगाये बैठा है प्रजा भी उसके साथ मिल चुकी है महाराज वो कभी भी हम पर हमला कर सकता है
दाहिर :- क्या प्रजा ......... मगर कैसे ?
मंत्री :- जब आप प्रजा पर उनके हैसियत से ज्यादा कर लाएंगे तो वो तो आपकी बागी हो ही जाएगी न सरकार
दाहिर फिर चिल्लाता हुआ :- नहीं नहीं .......
:- मुहम्मद बिन कासिम को मेरी तरफ़ से ख़त पहुँचाओ
दाहिर सेन कि तरफ से भेजा गया एक संदेशवाहक मुहम्मद बिन कासिम के सामने पत्र पढ़ता हुआ :- मैं राजा दाहिर सेन सिंध का महाराज, मुहम्मद बिन कासिम को ये चेतवानी देता हूं की वो जल्द से जल्द अपनी फौज को लेकर वापिस शिराज लौट जाये और जो भी तबाही हुई है उसका हरजाना भरे वरना हमारी तकतवार फौज आप लोगो कि छोटी सी फौज को पूरी तरह खत्म कर देगी
तभी मुहम्मद बिन कासिम रफ़्तार के साथ खड़े हुए और संदेशवाहक को एक धक्का देकर पत्र को कई टुकडो में बाँट देते हैं और संदेशवाहक के मुँह पर एक जोरदार तमाचा मारते हुए कहते हैं :- जाओ अपने राजा दाहिर सेन से कह दो की मुहम्मद बिन कासिम का ईमान एक अल्लाह पर है और उसी अल्लाह के भरोसे ही मुहम्मद बिन कासिम ने ये सफर तय किया है हमारी फौज हर वक्त जद्दोजहद के लिए तैय्यार है अगर हमें आजमाना है तो आओ जंग के मैदान में हमें आजमा कर देखलो
कहानी जारी है .......................
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