बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
डिस्क्लेमर :-
यह कहानी मुहम्मद बिन क़ासिम रहमतुल्लाह अलैह
गाजी कि जिंदगी पर लिखी गयी है
इस लेख से जुड़ी जानकारीयाँ विकिपीडिया से लिये गये हैं और इस कहानी को बयान करने का थीम लेखक का अपना विचार है
इस कहानी का सिर्फोसीर्फ मकसद मुसलमानों के दरमियान उनके सुनहरे तारिख से रूबरू कराना है
यह कहानी इसके अलावा और किसी मकसद के लिए नहीं लिखा गया है
बराहे करम अपने सवाबदीद पर अमल करें
छठें एपिसोड में आपने पढ़ा कि देबल बंदरगाह की जीत के बाद , मुहम्मद बिन कासिम सिंधु नदी के किनारे पड़ाव डाले बैठे थे रोहड़ कीले को जीतने के लिए
राजा दाहिर अपनी मंत्रीजनों के साथ बैठ कर मुहम्मद बिन कासिम को किस तरह हराये इस पर विचार कर रहा था , राजा दाहीर का संदेशवाहक राजा दाहिर का संदेश लेकर मुहम्मद बिन कासिम के पास पहुँचता है जिसे पढ़कर मुहम्मद बिन कासिम जंग का ऐलान कर देते हैं
जगह - रोहड़ का एक बंजर मैदान इलाका जिसके दोनों तरफ दो तरह कि फौज खड़ी थी
मुहम्मद बिन क़ासिम एक अजीम सिपाहसालार अपने घोड़े पर बैठकर अपने फौजी टुकड़ियों को सम्बोधित करते हुए कहते है :-
ए अल्लाह के बहादुर मुजाहिदों , यह जंग हमारी आन बान हक और शान की लड़ाई है
यह जंग है खिलाफत के लिये , यह जंग दीन ए इस्लाम के लिये है
आज यह जंग है हर उस मुजाहिद के लिये है जो जिता है खिलाफत के लिये जो जिता है दीन ए इस्लाम के लिये
नारा ए तकबीर
तभी मुजाहिदों की फौज ( जोर से बोलते हुए ) - अल्लाह हु अकबर , अल्लाह हु अकबर , अल्लाह हु अकबर , अल्लाह हु अकबर , अल्लाह हु अकबर , अल्लाह हु अकबर , अल्लाह हु अकबर ,
अल्लाह हु अकबर , अल्लाह हु अकबर ,अल्लाह हु अकबर , अल्लाह हु अकबर , अल्लाह हु अकबर
मैदान के दूसरी तरफ , दाहिर सेन की एक बड़ी फौज खड़ी थी 50 हजार पैदल सेना 7 हजार घुड़सवार और तीन हजार हाथी सवार
राजा दाहिर कि फौज , मुहम्मद बिन क़ासिम कि फौज से बहोत बड़ी थी
मुहम्मद बिन क़ासिम कि फौज, इतनी बड़ी फौज के सामने ना टिक पाने के समान थी जहाँ कुछ हजार लोग सिंध कि प्रजा थी जो सिंध में तख्तापलट चाहते थे राजा दाहिर के लिये यह लड़ाई अपने राजसत्ता के नेतृत्व के लिये थी
जहाँ मुहम्मद बिन क़ासिम लिये यह जंग सिर्फ दीन ए इस्लाम के गलबा और बातिल पर हक के ऊरूज पर मबनी थी
दोनों फौज एक दुसरे की तरफ दौड़ते हुये
दाहीर का मंत्री चिल्लाता हुआ - आक्रमण..........
इधर मुहम्मद बिन क़ासिम- हमला...........
और देखते ही देखते दौनों फौज एक दुसरे में मिल जाते हैं
• "तुझको मालुम है लेता था , कोई नाम तेरा ।
कुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तेरा।"
अपने घोड़े को दौड़ाए हुये मुहम्मद बिन क़ासिम सिंध कि धुल को हवा मे उड़ाते हुये अपनी तलवार खुले हवा में लहराये तीर कि तरह आगे बढ़ रहे थे
• बस रहे थे यहीं सल्जूक भी, तूरानी भी ।
अहल-ए-चीं चीन में, ईरान में सासानी भी ।
इसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भी ।
इसी दुनिया में यहूदी भी थे , नसरानी भी ।
हवा में हजारो कि तादाद में तीरों कि बरसात , मुहम्मद बिन क़ासिम कि फौज पर होने को थी
तभी वजीर ( चिल्लाता हुआ) :- बचो
अपनी अपनी ढाल से अपनी हिफाजत करो
• पर तेरे नाम पर तलवार उठाई किसने ?
बात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किसने ?
मुहम्मद बिन क़ासिम अपनी तलवार दाहिर के फौज के पहले सिपाही पर चलाते हुये उसका सीना चीर देते हैं
और एक नजर अपनी तलवार को देखते हैं
• थे हमीं एक तेरे मअर का आराओं में ।
खुश्कियों में कभी लड़ते, कभी दरियाओं में ।
दी अज़ानें कभी रोम के कलीशाओं में ।
कभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सेहराओं में ।
शान आँखों में न जँचती थी जहाँदारों की ।
कलेमा पढ़ते थे हम छाँव में तलवारों की ।
मुहम्मद बिन क़ासिम के एक एक सिपहसलार और एक एक सिपाही जैसे आज अपने तलवार के हुनर का माहिर बन चुका था रोहड़ का मैदान जैसे मुजाहिदों के लिये मश्क का मैदान बन चुका था
आज मुजाहिदो के तलवार कि धार और उस पर पढ़ने वाले सूरज कि रोशनी की चमक , मुसलमानों कि जीत की गवाही दे रहा था
• हम जो जीते थे, तो जंगों की मुसीबत के लिए
और मरते थे तेरे नाम की अज़मत के लिए ।
थी न कुछ तेग़ ज़नी अपनी हुकूमत के लिए
सर बकफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिए ?
कौम अपनी जो ज़रोमाल-ए-जहाँ पर मरती
बुत फरोशी के एवज़ बुत-शिकनी क्यों करती ?
अल्लाह कि रहमत और उसके बरकत से यह फातेह शिराजी फौज , रोहड़ के मैदान पर हौसलों कि फतेह पा चुकी थी , दाहिर कि फौज के दिलों में मुसलमान मुजाहिदों का यह डर ही , काफिर फौज पर मुसलमानों कि असल फतेह थी
• टल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थे ।
पाँव शेरों के भी मैदां से उखड़ जाते थे ।
तुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थे ।
तेग़ क्या चीज़ है, हम तोप से लड़ जाते थे ।
नक़्श तौहीद का हर दिल पे बिठाया हमने ।
तेरे ख़ंज़र लिए पैग़ाम सुनाया हमने ।
दोनो फौज एक दुसरे में मिल कर एक दुसरे को काटने फाड़ने में लगी थी जहाँ देखो वही तलवार बाजी का हुनर कही किसी के सीने मे तलवार उतर चुका था तो कही किसी के पेट के आर पार
कोई अपनी आखिरी साँस तक जद्दोजहद कर रहा था तो कोई किसी को मौका भी नही दे रहा था
इस दरम्यान मुहम्मद बिन क़ासिम कि फौज ने अपना वो सारा हैरत गजब दिखा दिया जो वो शिराज और देबल बंदरगाह को जितते वक्त दिखा चुके थे
रोहड़ के मैदान पर मुसलमानों जंगजुऔ की तलवार, दाहीर सेन कि फौज पर इस तरह उतरी थी के मानो कि अल्लाह का अजाब उतरा हो
• तू ही कह दे के, उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किसने?
शहर कैसर का जो था, उसको किया सर किसने?
तोड़े मख़्लूक ख़ुदाबन्दों के पैकर किसने?
काट कर रख दिये कुफ़्फ़ार के लश्कर किसने?
किसने ठंडा किया आतिशकदा -ए-ईरां को ?
किसने फिर ज़िन्दा किया तज़कराए-ए-यज़दां को ?
कौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुई ?
और तेरे लिए जहमतकश-ए-पैकार हुई ?
किसकी शमशीर जहाँगीर, जहाँदार हुई ?
किसकी तक़दीर से दुनिया तेरी बेदार हुई ?
किसकी हैबत से सनम सहमे हुए रहते थे ?
मुँह के बल गिरके 'हु अल्लाह-ओ-अहद' कहते थे ।
तलवार से तलवार टकराने कि आवाज़ हाथियों के चिंघाड़ने कि आवाज और घोड़ों का उठाया हुआ धुल में गर्द गुब्बार
और मुस्लिम मुजाहिद का यह हौसला जिसने जंग का समाँ बाँध रखा हुआ था
बागी प्रजा कि जुटी फौज तीरबाजी कला में माहिर थी
बारूद के गोले फेंकने वाले तोपखाने भी बखुबी अपना किरदार अदा कर रहे थे
• आ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़
क़िब्ला रू हो के ज़मीं बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़ ।
एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद -ओ- अयाज़
न कोई बन्दा रहा, और न कोई बन्दा नवाज़ ।
बन्दा ओ साहिब ओ मोहताज़ ओ ग़नी एक हुए
तेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुए ।
मुहम्मद बिन क़ासिम , दाहिर सेन कि फौज से घिरे हुए थे
कमसकम दस से बारह लोगों के झुंड से घिरे मुहम्मद बिन क़ासिम सभी का दिलेरी से मुकाबला कर रहे थे
बारी बारी से सभी का मुकाबला करते हुए अपने तलवार का बोझ उठा उठा कर उनपर गिराते हैं एक के गले पर तलवार का बोझ लगते ही सर तन से उजड़कर जमीन पर गिरता है दुसरे के पेट पर तलवार घुसा कर बाहर निकालते है तो तीसरे के मुँह पर अपने तलवार के जत्थे से इतने जोर से मारते है कि उसके मुँह से दाँत के साथ साथ खुन निकलने लग जाता है
उछल कर सामने से आते हुये दो लोगों पर तलवार से वार करते है और फिर सामने खड़ा एक काफिर तलवार घुमा घुमा कर , मुहम्मद बिन क़ासिम पर वार करने आता है मगर
मुहम्मद बिन क़ासिम एक हाथ से उसके तलवार को पकड़ कर उसके मुँह पर एक घुसा मारते हैं
ऐसी ताकत ऐसी हैबत उन्होंने इस जंग के मैदान पर दिखायी होती है कि एक अकेले तलबार बाज का दस बारह कि भीड़ से भिड़ना दाहीर सेने के फौज के सिपाहियों ने सपने में भी नही सोची होगी
मुहम्मद बिन क़ासिम के तलवार कि मारकाट ने मुजाहिदो की फौज को हौसला दिया था
जंग के मैदान में सबसे पहले खड़े होकर दाहिर कि फौज को ललकारा था
• महफिल-ए-कौन-ओ मकामे सहर-ओ-शाम फ़िरे
मय-ए-तौहीद को लेकर सिफ़त-ए-जाम फिरे ।
कोह-में दश्त में लेकर तेरा पैग़ाम फिरे
और मालूम है तुझको कभी नाकाम फिरे ?
मुहम्मद बिन क़ासिम, अपने घोड़े से छलांग लगाते हुये उन्होंने दोनों हाथों से तलवार पकड़ा हुआ था
सामने दाहिर कि अपनी फौज का एक सिपाही अपना बचाव करता हुआ
• दश्त-तो-दश्त हैं, दरिया भी न छोड़े हमने ।
बहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिये घोड़े हमने ।
मुसलमानों की तलवार का बोझ जैसे दाहिर कि फौज से सहा नहीं जा रहा था रोहड़ के मैदान में दाहीर की फौज की तादाद से कई ज्यादा मुहम्मद बिन कासिम की फौज के जज्बे का बोल बाला था दाहीर की फौज ने इस तरह कि जाँबाजी पहली बार देखी थी मुसलमान जंगजूओ ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था
दाहीर की फौज अपना नियंत्रण खो कर भीड़ में भगदड़ मचा रही थी और मुसलमानो का एक बेहतरीन तीरबाज़ एक अचुका निशाना दाहिर कि फौज कि कमान सँभालने वाले मंत्री पर लगता है
और वो हाथी से गिर कर जमीन मे ध्वस्त हो जाता है
दाहिर सेन हाथी पर बैठे बैठे ही अपनी मौत को देख रहा था उसकी हिफाजत करने वाली फौज अब मुसलमानो के तलवार का निशाना बन रहे थे। राजा दाहिर अपनी मौत को अपने सामने देख झल्ला उठा और हाथी से उतर कर खुद लड़ने आ उतरा और खुद ही अपनी मौत की वजह बना
दाहीर की मौत देख फौज में और भी निराशा झलक उठी दाहीर के मंत्री जन एक दुसरे की तरफ़ देख कर सर निचे करने लगे
सूरज डूबने के करीब आते आते दाहिर के कई मंत्रीजन हथियार डाल चुके तो कई बंदी बना लिये गये थे
• सिफ़हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हमने ।
दौर-ए-इंसा को ग़ुलामी से छुड़ाया हमने ।
तेरे काबे को ज़बीनों पे बसाया हमने
तेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हमने ।
मुहम्मद बिन क़ासिम , लाश के ढेरों के बीच खड़े होकर उस खुन से सनी जमीन को देखते हैं और आसमान कि तरफ एक नजर फेरकर
अल्लाहु अकबर कहते हुये सजदा रेज हो जाते हैं
राजा दाहिर के मंत्रीजन मुहम्मद बिन कासिम रहमतुल्लाह अलैह से संधि के लिए तैयार हो जाते हैं रोहड़ का किला भी पुरी तरह से अब मुहम्मद बिन कासिम के नियंत्रण में था
मुहम्मद बिन क़ासिम सिंध के तख्त पर बैठकर :-अब हमारा अगला हमला मुल्तान की तरफ होगा मुल्तान के सफर के लिये भी हमारा लश्कर भेज दो इंशाअल्लाह फतेह हमारी होगी
वजीर :- जी हुजूर ऐसा ही
मुहम्मद बिन क़ासिम एक खत अपने तायाजान हज्जाज बिन युसुफ को भी लिखते हैं
हज्जाज बिन युसुफ अपने बिस्तर में लेटे हुए मुहम्मद बिन क़ासिम का खत पढ़ते हैं "अस्सलामुअलैकुम वा रहमतुल्लाही वा बरकताहु" ताया जान हमारा महाज बाकी सभी महाजों में से अल्लाह कि रहमत और बरकत से बेहतर रहा रहा हमनें एक एक करके सारे मुकामात जीत लिए हैं सिंध का रोहड़ किला अब हमारे कब्जे में है
दाहीर के बाकी वजीर और बड़े बड़े पदो में मौजूद सिपाहसालार हमसे संधि करने के लिये तैयार हो चुके हैं
मुल्तान के जानिब हमने अपना एक लश्कर भेज दिया है इंशाअल्लाह फतेह हमारी होगी
हज्जाज बिन युसफ खत को पढ़कर आंखों में आँसु लिए हाथ उठाकर अल्लाह से दुआ करते हैं "या अल्लाह मुहम्मद बिन कासिम की हिफाजत फरमा"
मुहम्मद बिन क़ासिम कि फौज मुल्तान को भी फतेह कर लेती है
मुहम्मद बिन कासिम अब सिर्फ फातेह शिराज या फातेह सिंध नहीं बल्कि फातेह मुल्तान भी बन चुके थे , यहाँ से मुहम्मद बिन क़ासिम ने सौराष्ट्र की तरफ भी फौजी दस्ते भेजे लेकिन राष्ट्रकूटों के साथ संधि हो गई।
मुहम्मद बिन कासिम अपने संदेशवाहको से भारतीय राजाओ को खत भिजवाते हैं
जिसे भारतीय राजाओ के सामने पढ़ा जाता हैं
"मैं फातेह शिराज , फातेह सिंध , फातेह मुल्तान मुहम्मद बिन कासिम उम्मैयद खिलाफत का जाँबाज सिपाहसालार, आप सब तमाम हिंदुस्तानी रियासतो के राजाओ को दीन ए इस्लाम की दावत देता हुँ
कि आप लोग इस्लाम अपना लें और आत्म-समर्पण कर दें। हम एक अल्लाह को मानने वाले है और हम उसी के मदद के तलबगार हैं हमने अल्लाह कि मदद से अपने एक छोटे से लशकर के जरिये दाहीर की एक बड़ी फौज को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया
और जिसे मेरी बातों पर यकीन नही वो जंग के मैदान में हमें आजमा सकता है"
मुहम्मद बिन कासिम सीरीज का अंत यही होता है उम्मीद है की आप सब मुसलमान भाइयों को ये सीरीज बहुत ही प्रेरणादायक लगा होगा ।
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