दिल्ली की रात हमेशा बेचैन रहती थी।
सड़कों पर पीली रोशनी की झिलमिलाहट, कहीं दूर बजते साइरन और गलियों में पसरा सन्नाटा शहर की बेचैनी को और गहरा कर देता था।
पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में उस रात तीन गुंडे एक छोटी दुकान के बाहर बंदूक ताने खड़े थे।
दुकानदार और उसकी छोटी बेटी कोने में दुबके हुए थे, तभी छत से कुछ गिरने की आवाज़ आई।
धूल और अंधेरे के बीच लाल रंग की एक आकृति ज़मीन पर उतरी।
वह थी वीरनायिका — सरोजिनी।
लाल सूट, लहराती केप और आँखों में आग।
“काफी हो गया,” उसने धीमी पर दृढ़ आवाज़ में कहा।
गुंडों ने हँसी उड़ाई, लेकिन अगले ही पल उनके चेहरे पर डर उतर आया जब सरोजिनी की चाल तूफ़ान जैसी हो गई।
कुछ ही सेकंड में तीनों जमीन पर पड़े कराह रहे थे।
दुकानदार की बेटी काँपते हुए बोली, “आप कौन हैं?”
सरोजिनी ने बस कहा, “मैं वही हूँ जो नहीं चाहती कि कोई मासूम डर के साए में जिए,” और अंधेरे में ग़ायब हो गई।
उस रात के बाद शहर में एक नया नाम गूँजने लगा — वीरनायिका।
लेकिन उसके सामने असली दुश्मन था “काला बाज़ार” — राघव भसीन, जो कभी सरकारी ठेकेदार था और अब अपराध जगत का मालिक।
वह आधे मुखौटे में दिखता था, ताकि कोई उसका चेहरा पहचान न सके।
हथियार, ड्रग्स और ज़मीन के सौदे — यही उसका धंधा था।
हर सौदे के पीछे किसी की ज़िंदगी की कीमत छुपी होती थी।
सरोजिनी जानती थी कि यह जंग सिर्फ़ ताकत की नहीं, रणनीति की भी थी।
एक रात उसे खबर मिली कि काला बाज़ार पुरानी सब्ज़ी मंडी में हथियारों की खेप भेजने वाला है।
वह छत पर पहुँची और नीचे देखा — राघव अपने गुंडों के साथ माल उतार रहा था।
“आज कोई माल बाहर नहीं जाएगा, राघव,” उसकी आवाज़ ऊपर से गूँजी।
सबकी नज़रें ऊपर उठीं।
वीरनायिका नीचे उतरी और ज़मीन काँप उठी।
गुंडे उसकी ओर झपटे, पर वह हवा की तरह हिली।
हर वार सटीक और तेज़।
कुछ ही पल में मैदान खाली हो गया।
काला बाज़ार मुस्कुराया, “तुझे लगता है तू मुझसे जीत सकती है?”
उसने ताली बजाई और अंधेरे से कुछ बच्चे बाहर आए।
“अगर तू मुझे रोकेगी, तो ये बच्चे कीमत चुकाएँगे।”
सरोजिनी ठिठक गई। उसकी आँखों में गुस्सा और दर्द दोनों थे।
“डर ही तेरी सबसे बड़ी कमजोरी बनेगा, राघव,” उसने कहा और धुएँ का बम फेंककर बच्चों को बचा लिया।
काला बाज़ार ने उसके खिलाफ़ पूरा सिस्टम खड़ा कर दिया।
पोस्टरों पर लिखा था — “वीरनायिका गद्दार है।”
टीवी चैनल्स और पुलिस दोनों उसे अपराधी बताने लगे।
लेकिन सरोजिनी नहीं रुकी।
वह दिन में भी लोगों के बीच जाने लगी।
कभी स्कूलों में आत्मरक्षा सिखाती, कभी मोहल्लों में सुरक्षा अभियान चलाती।
धीरे-धीरे लोग उसके साथ खड़े होने लगे।
राघव ने अपने सबसे ख़ास आदमी ताहिर को भेजा — एक पूर्व सैनिक।
पुराने पुल पर दोनों आमने-सामने हुए।
ताहिर बोला, “अब भाग कहाँ जाएगी?”
सरोजिनी ने अपनी एनर्जी ब्लेड निकाली, “मैं भागती नहीं, रोकती हूँ।”
दोनों के बीच भीषण लड़ाई हुई।
वार पर वार, बिजली की चमक, पानी में पड़ती चिंगारियाँ।
आख़िरकार सरोजिनी ने ताहिर को गिरा दिया।
“राघव के लिए क्यों लड़ता है?” उसने पूछा।
ताहिर बोला, “क्योंकि अब इस शहर में कोई सच्चा नहीं बचा।”
“तब झूठ से लड़ना ही सच्चाई है,” उसने कहा और उसे छोड़ दिया।
अब जनता खुलकर वीरनायिका के साथ थी।
लोग सड़कों पर उतरे, दीवारों पर लिखा — “हम सब वीरनायिका हैं।”
काला बाज़ार बोला, “अगर जनता मेरे खिलाफ़ खड़ी होगी, तो मैं शहर जला दूँगा।”
लेकिन सरोजिनी को उसका ठिकाना मिल चुका था — पुराना डॉकयार्ड।
वह अकेली अंदर घुसी, गार्ड्स और कैमरों को चकमा देते हुए।
राघव सामने आया, मुखौटा उतारते हुए बोला, “अब देख, तेरी हिम्मत का अंजाम।”
सरोजिनी शांत स्वर में बोली, “डर के पार ही हिम्मत शुरू होती है।”
दोनों में आख़िरी मुकाबला हुआ।
राघव के हथियार टूट गए, और उसकी साँसें थम गईं।
सरोजिनी ने विस्फोटक सिस्टम निष्क्रिय किया और बाहर निकल आई।
सुबह जब सूरज उगा, तो शहर की दीवारों से झूठे पोस्टर हट चुके थे।
लोगों ने राहत की साँस ली।
बच्चे स्कूल जा रहे थे, दुकानों के ताले खुल गए थे।
कोई नहीं जानता था कि वीरनायिका कहाँ गई।
बस इतना मालूम था कि अब दिल्ली फिर डर के साए में नहीं जिएगी।
कहा जाता है, उस रात एक औरत लाल सूट में पुराने किले की दीवार पर खड़ी थी।
हवा में उसका केप लहरा रहा था, और आँखों में वही चमक थी —
वो चमक जो बताती थी कि जंग अभी खत्म नहीं हुई।
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