Episode 1
कुंभलगढ़ के घने जंगलों में उस रात अजीब सन्नाटा था।
हवा पेड़ों के बीच सरकती हुई गुजर रही थी, जैसे कोई अदृश्य आत्मा शाखाओं से फुसफुसा रही हो।
अमावस्या थी — आसमान पर कोई चाँद नहीं, कोई रोशनी नहीं।
दूर कहीं किसी उल्लू की आवाज़ उस सन्नाटे को और गाढ़ा बना रही थी।
रुद्र प्रताप सिंह अपने साथी समर खान के साथ जंगल के भीतर बढ़ रहा था।
दोनों के कंधों पर बंदूकें थीं, और आँखों में वही चमक थी जो केवल शिकारी में होती है — शिकार का निशान ढूँढने की।
“आज उस दरिंदे का अंत करेंगे,” रुद्र ने फुसफुसाया, बंदूक के ट्रिगर को हल्के से दबाते हुए।
समर ने धीमे स्वर में कहा, “या फिर वो हमारा करेगा, रुद्र। सुना है उसकी आँखें इंसान जैसी हैं।”
रुद्र मुस्कुराया, “आँखें नहीं, समर, जानवरों में कभी इंसानियत नहीं होती।”
और तभी झाड़ियों के पीछे से एक गर्जना गूँज उठी — इतनी भयानक कि हवा थम गई।
पेड़ों की टहनियाँ हिल उठीं।
अगले ही पल एक भारी शरीर उन पर झपटा — वह बाघ था।
पर बाघ की चाल में कुछ अलग था — वह साधारण शिकारी नहीं था।
उसकी आँखें सच में इंसान जैसी थीं, क्रोध और चेतना से भरी हुई।
समर के पास बचने का कोई मौका नहीं था।
पंजों का वार इतनी ताक़त से पड़ा कि वह ज़मीन पर गिरा और कुछ ही सेकंड में उसका शरीर निश्चल हो गया।
रुद्र ने गोली चलाई, फिर दूसरी, फिर तीसरी — पर बाघ गिरा नहीं।
बल्कि उसकी नज़रें रुद्र पर टिकी रहीं — जैसे पहचानने की कोशिश कर रही हों।
रुद्र पीछे हटा, ठोकर लगी, और वह काई से ढकी ज़मीन पर गिर गया।
बाघ ने छलाँग लगाई, उसके चेहरे के पास तक आया, और फिर... रुक गया।
कुछ क्षणों के लिए दोनों की आँखें मिलीं।
रुद्र ने उस नज़र में कुछ देखा — कोई दर्द, कोई याद, या शायद कोई श्राप।
फिर बाघ मुड़ा और घने पेड़ों के बीच गायब हो गया।
रुद्र घायल था, उसके सीने पर पंजों के गहरे निशान थे।
वह किसी तरह उठकर लड़खड़ाते हुए भागा — जंगल के रास्ते, झाड़ियों और काँटों के बीच से, जब तक कि सामने एक नदी नहीं आ गई।
नदी का पानी चाँदी की तरह चमक रहा था, मगर रात गहरी थी।
रुद्र वहीं गिर पड़ा।
और तभी उसकी नज़र पानी के बीचोंबीच किसी हरे उजाले पर पड़ी — एक ताबीज़, जो जल के भीतर चमक रहा था।
उसका शरीर काँप रहा था, पर किसी अजीब शक्ति ने उसे खींच लिया।
वह पानी में उतरा, हर कदम के साथ अंधकार गहराता गया।
जैसे ही उसने ताबीज़ को छुआ —
आसमान की आखिरी किरण भी बुझ गई।
एक तीखी हरी रेखा पानी से निकलकर उसके शरीर में समा गई।
रुद्र चीखा, पर आवाज़ बाहर नहीं निकली।
उसकी नसें हरी रोशनी में चमक उठीं, उसकी हड्डियाँ जैसे टूटकर फिर से जुड़ रही थीं,
उसके हाथों पर बाल उगने लगे, चेहरा लंबा हुआ, और आँखें — वो अब इंसान की नहीं रहीं।
कुछ ही क्षणों में रुद्र प्रताप सिंह अब इंसान नहीं रहा।
वह आधा इंसान, आधा भेड़िया बन चुका था।
उसने सिर उठाकर अँधेरे आसमान की ओर दहाड़ लगाई —
एक ऐसी आवाज़ जिसने जंगल की हर शाखा को हिला दिया।
उस रात अमावस्या ने एक शिकारी को रक्षक में बदल दिया।
सुबह का सूरज पहाड़ियों के ऊपर से झाँक रहा था।
रुद्र किसी झोंपड़ी के भीतर खाट पर पड़ा था।
बदन पर पट्टियाँ थीं, चेहरा थका हुआ, आँखें भारी।
उसके पास एक बूढ़ा आदिवासी बैठा था — चेहरे पर झुर्रियाँ, लेकिन आँखों में शांति।
“तू नदी किनारे पड़ा मिला था, बेटा,” बूढ़े ने कहा,
“तेरे शरीर पर पंजों के निशान थे, जैसे किसी जानवर ने नोचा हो।”
रुद्र उठकर बैठा, दर्द से कराहा, “मैं… जिंदा कैसे बचा?”
बूढ़ा धीमे स्वर में बोला, “जंगल ने तुझे खुद बचाया। सबका कोई न कोई मकसद होता है, बेटा। तू भी किसी काम के लिए लौटा है।”
रुद्र कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला, “मेरा दोस्त मर गया… उस बाघ ने…”
बूढ़ा उसकी बात बीच में काटते हुए बोला, “हर बाघ आदमखोर नहीं होता। कभी-कभी जंगल किसी इंसान का रूप ले लेता है ताकि अपने दुख का बदला ले सके।”
रुद्र चुप हो गया।
उसने बूढ़े की ओर देखा, फिर बाहर झोंपड़ी के दरवाज़े की ओर बढ़ा।
“मैं लौट रहा हूँ,” उसने कहा, “शायद शहर के बीच मैं समझ पाऊँ कि मेरे साथ क्या हुआ।”
“समझ तब आएगी,” बूढ़े ने जवाब दिया, “जब तू ये जान लेगा कि तू अब वही नहीं रहा।”
रुद्र ने झोंपड़ी से निकलते हुए पीछे देखा — बूढ़ा मुस्कुरा रहा था, जैसे सब जानता हो।
कहानी जारी है ……………………
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