Episode 2
शहर पहुँचते ही रुद्र को कुछ अजीब महसूस हुआ।
सड़कें शोर से भरी थीं, गाड़ियाँ दौड़ रही थीं,
पर उसके कान अब सिर्फ़ हवा की आवाज़ सुन रहे थे — दूर कहीं जंगल की।
उसके भीतर अब भी कोई ताक़त मचल रही थी, जिसे वह दबा नहीं पा रहा था।
वह अपने पुराने घर पहुँचा।
दीवारों पर बंदूकें टंगी थीं, समर की तस्वीर लगी थी।
वह उसके सामने खड़ा रहा, आँखें नम थीं।
“समर,” उसने बुदबुदाया, “मैं लौट आया हूँ… पर अब मैं वही नहीं जो गया था।”
उस रात उसे नींद नहीं आई।
बाहर बादल गरज रहे थे।
वह शीशे में अपना चेहरा देख रहा था — आँखों में हल्की हरी चमक थी, त्वचा पर नुकीले बाल।
उसने खुद से पूछा, “मैं क्या बन गया हूँ?”
तभी बाहर किसी के कदमों की आहट आई।
वह खिड़की से झाँका — काले कपड़ों में कुछ लोग, हथियारों से लैस, उसके घर की ओर बढ़ रहे थे।
उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा।
वह अब सिर्फ़ इंसान नहीं रहा था, और शायद वही बात किसी को पता चल चुकी थी।
दरवाज़ा टूटा, गोलियाँ चलीं।
पर जो भीतर से निकला, वह अब रुद्र प्रताप नहीं था।
वह दौड़ा, झपटा, पंजों से एक को गिराया, दूसरे को दीवार पर दे मारा।
हर वार बिजली की तरह था।
कुछ ही सेकंड में सब सन्नाटा।
साँसें तेज़ चल रही थीं, आँखें हरी चमक रही थीं।
रुद्र ने खून सने हाथों को देखा और कांप गया।
“मैंने… ये क्या किया?”
वह घुटनों के बल बैठ गया।
उसके भीतर का जानवर और इंसान दोनों लड़ रहे थे —
एक रोकना चाहता था, दूसरा दहाड़ना।
वह चीखकर बोला, “मुझे छोड़ दो!”
पर जंगल की हवा अब शहर की दीवारों के पार भी उसकी पुकार सुन रही थी।
उसी समय, शहर के बायोजेनेटिक रिसर्च सेंटर में डॉ. विशाल मल्होत्रा स्क्रीन के सामने खड़ा था।
सामने थर्मल फुटेज चल रही थी — रुद्र के घर की, जहाँ रात को असामान्य ऊर्जा सिग्नेचर दर्ज हुआ था।
“सर,” सहायक ने कहा, “ये वही पैटर्न है जो पिछले महीने कुंभलगढ़ के जंगल में रिकॉर्ड हुआ था।”
डॉ. विशाल ने धीमे स्वर में कहा, “तो प्रयोग सफल हुआ है… जंगल ने खुद विकास की अगली सीढ़ी बना ली है।”
सहायक ने घबराकर पूछा, “सर, ये चीज़ खतरनाक भी हो सकती है।”
“खतरा?” विशाल ने मुस्कुराया, “नहीं… अवसर। अगर मैं इस शक्ति को नियंत्रित कर लूँ, तो मैं प्रकृति की सीमाएँ मिटा दूँगा।”
वह धीरे-धीरे कैमरे की ओर मुड़ा।
“तैयार करो टीम को। कुंभलगढ़ चलना होगा। वहाँ से सब शुरू हुआ था, और वहीं खत्म होगा।”
रुद्र अब शहर से निकल चुका था।
उसने पुरानी जीप उठाई और उसी दिशा में चला जहाँ से उसकी कहानी शुरू हुई थी।
सूरज ढल रहा था, पहाड़ियाँ लाल रंग में नहाई हुई थीं।
उसकी आँखों में दृढ़ता थी, पर भीतर गहराई में डर भी था —
डर इस बात का कि शायद अब वह कभी इंसान नहीं बन पाएगा।
वह जंगल के किनारे पहुँचा, जीप रोकी, और कुछ देर हवा में साँस ली।
हवा वही थी — मिट्टी, पेड़ों और रहस्य की गंध से भरी।
वह मुस्कुराया।
“तू लौट आया है, वृक्षक,” हवा ने जैसे फुसफुसाया।
रुद्र ने कदम बढ़ाया — कुंभलगढ़ के जंगलों की ओर।
जंगल की हवा में शाम की नमी घुली हुई थी।
पेड़ों की पत्तियाँ एक-दूसरे से सटकर खामोशी तोड़तीं, जैसे कोई पुरानी भाषा में कुछ कह रही हों।
रुद्र कुंभलगढ़ के भीतर गहराई तक उतर चुका था।
हर कदम पर उसे लगता जैसे धरती उसे पहचान रही है — उसके तलवों के नीचे की मिट्टी कुछ कहती है, झाड़ियों में सरसराहट होती है, और ऊपर टहनियों से कोई अदृश्य नज़र उसे देखती है।
वह नदी के किनारे पहुँचा — वही जगह जहाँ उसने ताबीज़ देखा था।
पानी अब शांत था, पर उसमें कुछ था जो सतह के नीचे सांस ले रहा था।
वह झुककर बोला,
“मैं लौट आया हूँ। तूने मुझे जो बनाया, अब मुझे उसका कारण बता।”
कहीं दूर कोई पुरानी ढोलक की सी आवाज़ गूंजी — गहरी और गंभीर।
फिर हवा में एक हल्का कंपन हुआ, और पानी की सतह पर वह ताबीज़ फिर से चमकने लगा।
हरी रोशनी लहरों पर बिखर गई, और उसी क्षण हवा में एक आकृति उभरी — धुएँ की तरह बनी, लेकिन स्थिर।
वह किसी बूढ़े साधु की छवि थी, जिसके माथे पर राख लगी थी और आँखें मानो समय के आर-पार देख रही थीं।
“वृक्षक…” आवाज़ गूँजी, “तू लौट आया है, जैसा अपेक्षित था।”
रुद्र ने सिर उठाया, “कौन है तू?”
कहानी जारी है ………………..
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