Episode 4
विशाल उसके पास आया, झुका, और बोला,
“देखो तो ज़रा… इंसान और जानवर का मिलन।
तू प्रकृति की गलती है, और मैं उस गलती को अपनी खोज बना दूँगा।”
रुद्र ने धीमे स्वर में कहा, “तू नहीं समझेगा, डॉक्टर। प्रकृति को कोई प्रयोगशाला में कैद नहीं कर सकता।”
विशाल मुस्कुराया, “देखते हैं।”
उसने इशारा किया, और रुद्र को बेहोशी का इंजेक्शन दे दिया गया।
जब रुद्र की आँखें खुलीं, वह किसी पारदर्शी टैंक के भीतर था।
चारों ओर नीली रोशनी, ऊपर मशीनें, और सामने शीशे के पार डॉ. विशाल।
“वृक्षक,” उसने कहा, “अब तू मेरा प्रयोग है। मैं तुझे नियंत्रित करूँगा, तेरा कोड समझूँगा, और तुझसे अपनी नई जाति बनाऊँगा — जो इंसान से श्रेष्ठ होगी।”
रुद्र ने काँच पर हाथ मारा — बिजली जैसी चमक फैली, पर काँच नहीं टूटा।
उसके भीतर का जानवर उफान पर था, पर इंजेक्शन ने उसे कमजोर कर दिया था।
विशाल ने बटन दबाया — उसके शरीर में झटके दौड़ गए।
“देख, रुद्र,” वह बोला, “ये है विज्ञान। तेरा जंगल अब मेरे नियंत्रण में है।”
पर तभी लैब की लाइटें झिलमिलाईं।
बाहर बिजली गिरी।
सेंसर बीप करने लगे।
सहायक चिल्लाया, “सर, सिस्टम ओवरलोड हो रहा है! बाहरी एनर्जी सर्ज!”
विशाल ने गुस्से में कहा, “कहाँ से?”
“जंगल से!” सहायक ने कहा, “वो ऊर्जा सिग्नेचर जो आपने पहले देखा था — अब सीधे यहाँ आ रहा है!”
अचानक लैब की दीवारें हिलने लगीं।
बिजली कड़कने की आवाज़ आई।
टैंक का काँच चटक गया।
रुद्र की आँखें हरी आग की तरह जल उठीं।
“तूने जंगल को ललकारा है, डॉक्टर,” उसकी आवाज़ गूँजी, “अब जंगल जवाब देगा।”
काँच फट गया, टैंक का द्रव बाहर उछला।
रुद्र बाहर निकला, उसकी पूरी देह हरे प्रकाश से घिरी हुई थी।
सैनिकों ने गोली चलाई, पर हर गोली हवा में पिघल गई।
उसने हाथ उठाया — हवा का झोंका उठा और गाड़ियों को उलट दिया।
बिजली की लपटें आसमान से गिरीं।
विशाल पीछे हटता गया।
“नहीं!” वह चिल्लाया, “मैंने तुझे बनाया है!”
“नहीं,” रुद्र ने कहा, “तूने सिर्फ़ प्रकृति का अपमान किया है।”
वह आगे बढ़ा। विशाल ने एक सीरिंज निकाली — उसमें वही हरी तरल पदार्थ था।
“अगर मैं तेरी शक्ति नहीं पा सकता, तो मैं खुद वही बनूँगा!”
उसने इंजेक्शन अपने गले में उतार दिया।
क्षण भर में उसका शरीर बदलने लगा — नसें फूलने लगीं, त्वचा सख़्त हो गई, और चेहरा विकृत।
वह दहाड़ा, “अब हम दोनों एक हैं, वृक्षक!”
रुद्र ने शांत स्वर में कहा, “नहीं, तू सिर्फ़ लालच है, और मैं संतुलन।”
दोनों एक-दूसरे पर टूट पड़े।
जंगल की गूँज भीतर तक पहुँच रही थी।
विशाल की ताक़त बर्बर थी, पर रुद्र की चाल धरती की तरह संयमित।
विशाल ने वार किया, पर रुद्र ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “प्रकृति सिखाती है, नष्ट नहीं करती।”
फिर उसने अपनी सारी ऊर्जा एक बिंदु में समेटी — और उस ऊर्जा को विशाल की छाती पर छोड़ दिया।
एक तेज़ हरी किरण फैली, और लैब में सन्नाटा छा गया।
जब रोशनी बुझी, तो वहाँ सिर्फ़ राख थी।
रुद्र ने गहरी साँस ली।
वह बाहर निकला — बारिश शुरू हो चुकी थी।
हर पेड़ जैसे उसे झुककर प्रणाम कर रहा था।
उसने आसमान की ओर देखा और कहा, “मेरा काम पूरा हुआ।”
सूरज की पहली किरणें जंगल की पत्तियों पर पड़ीं।
नदी अब शांत थी।
वही ताबीज़ फिर से पानी में चमक रहा था — इस बार हल्की सुनहरी रोशनी के साथ।
रुद्र ने उसे उठाया और अपने गले में पहन लिया।
उसकी आँखें अब भी हल्की हरी थीं, पर उनमें संतुलन था — न जानवर, न इंसान, बस वृक्षक।
उसने पेड़ों की ओर देखा, “अब कोई इस धरती को नहीं छुएगा जब तक मैं साँस ले रहा हूँ।”
हवा चली, पक्षी गाए, और कुंभलगढ़ फिर से जिंदा हो उठा।
कुछ हफ्तों बाद,
शहर में एक वैज्ञानिक सम्मेलन में किसी ने प्रश्न उठाया —
“डॉ. विशाल मल्होत्रा का क्या हुआ?”
किसी ने उत्तर दिया, “वो कुंभलगढ़ में लापता हो गए।”
लेकिन हर अमावस्या की रात, पहाड़ियों से एक दहाड़ सुनाई देती है —
कभी इंसान जैसी, कभी भेड़िए जैसी।
लोग उसे ‘वृक्षक’ कहते हैं —
वो जो अब प्रकृति का प्रहरी है,
और जो जानता है — कि जंगल कभी अकेला नहीं होता।
कहानी यहीं खत्म होती है
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