जगह - इराक देश का एक पिछड़ा गांव इलाका
गर्मियों का मौसम और बगदाद का एक गांव जहां खालिद अपने खेत में काम कर रहे हैं, और कुछ देर बाद घर आते हैं
अब्दुल राशिद भी फिलहाल स्कुल से अपने घर ही आया था
अब्दुल राशिद : अस्सलामुअलैकुम
आबिदा( अब्दुल रशीद की माँ ) : वा अलैकुमुस्सलाम बा रहमतुल्लाही बा बरकताहु बेटा
खालिद अपने घर आते हुए कमाल के पास
खालिद : आखिर स्कूल वालों ने क्या कहा, राशिद
अब्दुल राशिद : बाबा , स्कूल वाले कह रहे हैं, आगे की पढ़ाई के लिए शहर में जाना होगा , और इसके लिये कुछ पैसों का इंतेज़ाम भी करना होगा
खालिद : ठीक है मैं कहीं ना कहीं से पैसों का इंतेजाम करता हुँ ,
जैसा की खालिद एक किसान है इसलिये उसके पास हमेशा पैसे की कमी होती थी, उसने ये सोचा था की वो अपने बेटे अब्दुल राशिद को कैसे भी चाहे इसके लिये खेत ही बेचनी पड़ जाये
वह उसको पढ़ा लिखा कर एक बड़ा आदमी बनायेगा और अपनी गरीबी और तंगहाली को ठीक करेगा
राशिद की माँ (आबिदा) , खालिद से :- आखिर पैसों का इंतेज़ाम होगा कैसे ?
खालिद एक मुस्कुराहट के साथ कहता है आखिर मेरे बाप दादाओ की जमीन कब काम मे आयेगी आबिदा
मेरा बेटा पढ़ने लिखने में होशियार है मैं कुछ बन नही सका तो क्या हुआ मैं अपने बेटे को एक बड़ा आदमी बना कर रहूँगा
अब्दुल राशिद पढ़ने लिखने में बहोत होशियार तो था मगर शारिरीक तौर पर ठीक नही था बल्कि बहोत कमजोर था , सिर्फ़ उसके स्टडी लाइफ में वो बहोत होनहार होने की वजह से और एक यही वो चीज़ है जिससे राशिद के मां बाप ने उससे उम्मीद रखी हुयी थी
कुछ दिनो बाद -
अपने बैग को पैक करके राशिद शहर जाने के लिये तैयार था
दरवाजे पर उसकी माँ आबिदा जिनके आँखों से आँसुयें बहते जा रहे थे
राशिद अपनी माँ :- अम्मा आप इतना रोओगी तो मैं आप लोगो को छोड़कर शहर जाऊँगा कैसे ?
आबिदा :- मेरी दुआयें तुम्हारे साथ है बेटे अल्लाह तुम्हें हर कदम पर कामयाबी अता करे
यह कहते हुये आबिदा , राशिद के सिर को चुमती है
खालिद :- चलो अब बहोत वक्त हो गया है , उसे बस से सफर करना है शहर की रवानगी के लिये
खालिद और राशिद दोनो कुछ रकम लेकर बगदार शहर की तरफ निकल पड़ते हैं
बगदाद शहर का विवरण :-
इराक की राजधानी बगदाद शहर एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाला एक जीवंत और ऐतिहासिक महानगर है। यह शहर बगदाद इराक के मध्य भाग में टाइग्रिस नदी पर स्थित है। शहर की जलवायु गर्म रेगिस्तानी है , जिसमें अत्यधिक गर्म ग्रीष्मकाल और हल्की सर्दियाँ होती हैं। इस शहर की स्थापना 762 ईस्वी में अब्बासिद खलीफा अल-मंसूर ने की थी और यह कभी इस्लामी स्वर्ण युग का केंद्र था। शहर का एक लंबा और जटिल इतिहास है, जिसमें विभिन्न साम्राज्य और राजवंश नियंत्रण के लिए प्रतिस्पर्धा करते रहे हैं। इराक का राष्ट्रीय संग्रहालय, जिसमें प्राचीन मेसोपोटामिया की कलाकृतियों और अवशेषों का विशाल संग्रह है।अल-मुतनब्बी स्ट्रीट, एक ऐतिहासिक सड़क जो किताबों की दुकानों, कैफे और सांस्कृतिक संस्थानों से सुसज्जित है। - ग्रैंड फेस्टिविटीज़ हॉल, आधुनिक इराकी वास्तुकला का एक शानदार उदाहरण है अब्बासिद पैलेस, 13वीं सदी का महल जो शहर के समृद्ध इतिहास को प्रदर्शित करता है। बगदाद अपने गर्मजोशी भरे आतिथ्य, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और जीवंत कला परिदृश्य के लिए जाना जाता है। यह शहर कई संग्रहालयों, दीर्घाओं और सांस्कृतिक संस्थानों का घर है। बगदाद शहर को हाल के वर्षों में संघर्ष, गृह युद्ध और बुनियादी ढांचे के मुद्दों सहित कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। हालाँकि, शहर संस्कृति और वाणिज्य का एक लचीला और जीवंत केंद्र बना हुआ है।
शहर पहुँचने पर दोनों ही एक लोकल होटल पर ठहरते हैं
इन बीते दिनों में ही खालिद राशिद के लिये एक किराये का घर तलाश कर लेते हैं और इस तरह उसके रहने खाने पीने का इंतजाम हो जाता है और शहर के एक बड़े युनिवर्सिटी में भी उसे दाखिला मिल जाता है
जिसके बाद खालिद , राशिद को अकेला छोड़कर वापिस गाँव लौट आते है
अब राशिद को अकेले ही शहर में रहना था ,
मगर कुछ ही दिनों में उसे पैसे की कमी महसूस होने लगी
उसने सोचा की यहाँ वो किसी दुकान पर काम कर लेगा और कुछ पैसे कमाया करेगा, और अपनी पढ़ाई लिखाई भी जारी रखेगा
राशिद जिस घर में रहते थे उसके मकान मालिक फरहीद चाचा थे
फरहीद चाचा एक अधेड़ उम्र के आदमी थे जिनकी बीबी इंतकाल कर चूकी थी और एक बेटा जो नाफरमान होने की वजह से उनको छोड़ के जा चुका था फरहीद चाचा अपनी जिंदगी की आखिरी मरहल्ले में तन्हा जिंदगी गुजार रहे थे
मगर जब से राशिद उनके घर किराये से रहने लगा था फरहीद चाचा को ऐसा लगा की उनका बेटा वापिस आ चुका है फरहीद चाचा राशिद को अपना बेटा मान चुके थे
इसलिये वो राशिद से किराये के पैसे के लिये उस पर दबाव नही डालते थे
फ़रहीद चाचा : अपने बारे में कुछ बताओ राशिद , आखिर तुम्हारे लिये तुम्हारे अब्बु अम्मी ने कोई लड़की देखी या नही ?
राशिद : जी नही चाचा , अभी कहाँ शादी अभी तो पढ़ लिखकर कुछ बनना चाहता हुँ
यहाँ शहर में पढ़ने के लिये ही आया हूँ , मेरे अब्बा एक किसान है
और उन्हे मुझसे बहुत उम्मीद है। चाचा आप भी अपने बारे में कुछ बताये आपका परिवार वगैरह ?
फ़रहीद चाचा : मेरी पत्नी का कुछ साल पहले इंतकाल हो गया था, मेरा बेटा बचपन से ही नफ़रमान था, जैसे जैसे बड़ा होता गया गलत कामों में शामिल हो गया और एक दिन वो मुझे अकेला छोड़ कर चला गया , और अब मैं अकेले ही जिंदगी जी रहा हुँ ऐसे में तुम मेरे घर किराये से रहने आये , तुम मुझे सकलो सुरत से बड़े ही भोले भाले लगे
राशिद : क्या आप मुझे अपने बेटे की जगह दोगे ?
फ़रहीद चाचा : क्यो नहीं इस उम्र में तुम मेरा एक सहारा हो राशिद
, और अब तुम्हें इस घर में रहने के लिये मुझे कोई किराया देने की जरूरत नही है
राशिद : आपका बहोत बहोत शुक्रिया चाचा , मैं हमेशा आपका खिदमतगार रहूँगा यह मेरा वादा है
फरहीद चाचा , राशिद को अपने गले से लगा लेते है
राशिद को एक घर मिल गया था अपने घर जैसा और इस अंजान शहर में एक दोस्त भी , अब बस उसे एक नौकरी चाहिये था।
राशिद : चाचा मुझे एक नौकरी भी चाहिए , क्योंकि मैं पढ़ना चाहता हूँ और मेरे पास इतना पैसा नहीं के कॉलेज का फीस भर सकुँ।
फ़रहिद: ठीक है, कल में तुम्हें एक म्युजियम में लेकर जाऊँगा जहाँ का मैं एक सीनियर वर्कर हूं, जहाँ मैं तुम्हें काम पर लगा दूंगा।
और सुबह वो दोनो उस म्युजियम पर गए
फ़रहीद चाचा : ये है वो म्युजियम
और फरहीद चाचा , राशिद को लेकर अंदर चले गये।
म्युजियम के अंदर से आवाज़ आई "म्युजियम में कोई नहीं है थोड़ी देर बाद आना"
फ़रहीद चाचा हँसते हुए : हम है कोई ग्राहक नहीं।
कहानी जारी है …………………….
Blog Comments (0)