असम की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया है। 2023 में चुनाव आयोग द्वारा किए गए डिलिमिटेशन (सीमा निर्धारण) के बाद अब 2026 के विधानसभा चुनाव पूरी तरह नई राजनीतिक नक्शे पर लड़ने जा रहे हैं। लगभग 50 साल बाद असम की विधानसभा और लोकसभा सीटों की सीमाएं बदली गई हैं। यह प्रक्रिया सिर्फ कागजी नहीं, बल्कि असम की जनसांख्यिकी, सांस्कृतिक संतुलन और राजनीतिक समीकरणों को गहराई से प्रभावित करने वाली है।
डिलिमिटेशन क्या है और असम में क्यों हुआ?
डिलिमिटेशन का मतलब है विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों की सीमाओं को जनसंख्या के आधार पर नए सिरे से तय करना, ताकि हर वोट की कीमत लगभग बराबर हो। असम में आखिरी बड़ा डिलिमिटेशन 1970 के दशक में हुआ था। उसके बाद जनसंख्या में काफी बदलाव आया, खासकर बांग्लादेश से आये शरणार्थियों के कारण कुछ इलाकों में जनसंख्या असंतुलन बढ़ गया।
2020 में केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर राज्यों के लिए डिलिमिटेशन प्रक्रिया शुरू करने का फैसला किया। चुनाव आयोग ने 2023 में ड्राफ्ट जारी किया, जन सुनवाई की, सुझाव-आपत्तियां लीं और अगस्त 2023 में फाइनल ऑर्डर जारी कर दिया। असम में कुल 126 विधानसभा सीटें और 14 लोकसभा सीटें बरकरार रखी गईं। लेकिन आरक्षण और सीमाओं में बड़ा बदलाव हुआ।
- अनुसूचित जाति (SC) के लिए विधानसभा सीटें 8 से बढ़कर 9 हो गईं।
- अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए सीटें 16 से बढ़कर 19 हो गईं।
- लोकसभा में ST के लिए 2 सीटें और SC के लिए 1 सीट आरक्षित की गई।
- 19 विधानसभा और 2 लोकसभा क्षेत्रों का नाम बदला गया।
- करीब 40 सीटों की सीमाएं काफी हद तक बदली गईं।
कुछ जिलों में सीटें बढ़ाई गईं, जैसे बोदो टेरिटोरियल रीजन में तीन अतिरिक्त सीटें और वेस्ट कार्बी आंगलोंग में एक अतिरिक्त सीट। Barak घाटी में सीटों की संख्या 15 से घटकर 13 रह गई, जिससे वहां काफी असंतोष हुआ।
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बार-बार कहा है कि इस डिलिमिटेशन ने स्वदेशी (indigenous) समुदायों को मजबूत किया है। उनका दावा है कि अब 103 में से 126 सीटों पर स्वदेशी समुदाय निर्णायक वोटर बन गए हैं। कई सीटों पर बांग्लादेश मूल के मुस्लिम शरणार्थियों का वोट बैंक पतला हो गया है, जहां पहले वे निर्णायक भूमिका निभाते थे।
ट्राइबल इलाकों में ST सीटों का बढ़ना बोडो, मिशिंग, कार्बी और अन्य जनजातीय समुदायों के लिए फायदेमंद माना जा रहा है। इससे छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ेगी। BJP और उसके सहयोगी दलों का मानना है कि यह प्रक्रिया असम की अस्मिता, संस्कृति और भौगोलिक अखंडता की रक्षा करेगी। 2026 के चुनाव में यह नया नक्शा BJP के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है, क्योंकि कई पुरानी "माइनॉरिटी डोमिनेटेड" सीटें अब संतुलित हो गई हैं।
हर बदलाव के साथ विवाद भी आता है। डिलिमिटेशन पर असम में काफी विरोध हुआ था। 2023 में जब ड्राफ्ट आया तो सिलचर, करीमगंज, शिवसागर और अन्य जगहों पर रैलियां, बंद और प्रदर्शन हुए। विपक्षी दल जैसे कांग्रेस, AIUDF और कुछ स्थानीय संगठनों ने इसे "गैरमैंडरिंग" (gerrymandering) बताया — यानी सीमाएं ऐसे बदली गईं कि एक खास समुदाय का वोट प्रभाव कम हो जाए।
कुछ इलाकों में दो पुरानी सीटों को मिला दिया गया, जैसे हाजो-सुआलकुची और भबानीपुर-सोरभाग। Barak घाटी में सीटों की कमी से बंगाली हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय नाराज हुए। AGP के एक विधायक ने तो पार्टी पद से इस्तीफा तक दे दिया था। कुछ संगठनों ने दावा किया कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की सीटें घटाई गईं या आरक्षित कर दी गईं, जिससे उनके प्रतिनिधित्व पर असर पड़ेगा।
चुनाव आयोग ने कहा कि 1200 से ज्यादा सुझाव-आपत्तियों पर विचार किया गया और 45% को मान लिया गया। फिर भी विरोध जारी रहा। अब 2026 चुनाव नजदीक हैं (9 अप्रैल 2026 को मतदान), और फरवरी 2026 में फाइनल वोटर लिस्ट जारी होने के बाद भी कुछ जगहों पर भ्रम है। गुवाहाटी में अब 5 विधानसभा सीटें हो गई हैं, लेकिन कई मतदाता अभी भी नहीं जानते कि उनकी नई सीट कौन सी है।
यह पहला चुनाव है जो डिलिमिटेशन के बाद हो रहा है। पुराने किले टूट गए हैं, नए गठबंधन बन रहे हैं। टिकट बंटवारे में अब सिर्फ वफादारी नहीं, नई सीमा के अनुसार वोट बैंक का गणित भी देखा जा रहा है। कई पुराने नेताओं के लिए यह "सर्वाइवल टेस्ट" बन गया है।
BJP का दावा है कि डिलिमिटेशन से असम में अवैध घुसपैठ रोकने और स्वदेशी हितों की रक्षा में मदद मिलेगी। वहीं विपक्ष कह रहा है कि इससे अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व कमजोर हुआ है। डिलिमिटेशन एक तकनीकी प्रक्रिया है, लेकिन असम जैसे विविधतापूर्ण राज्य में यह जनसांख्यिकीय बदलाव को भी दर्शाता है।
असम की जनता को अब समझना होगा कि नई सीटों में उनका वोट कैसे प्रभावी होगा। स्वदेशी संस्कृति, भाषा (असमिया, बोडो, बंगाली आदि) और विकास के मुद्दे अब और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं।
Blog Comments (0)