इस्लाम एक मुकम्मल ज़िंदगी का निज़ाम है। यह सिर्फ इबादत और नमाज़ तक सीमित नहीं बल्कि इंसान की सामाजिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत ज़िंदगी के लिए भी साफ़ दिशा-निर्देश देता है। शादी या निकाह इस्लाम में बहुत अहम दर्जा रखता है। कुरआन ने इसे “मिसाक़न ग़लीज़ा” (सूरह अन-निसा 4:21) यानी एक मज़बूत अहद (पक्का वादा) कहा है। इस्लाम निकाह को मोहब्बत, रहमत और ज़िम्मेदारी का रिश्ता बताता है।
इस्लाम में विवाह के नियम अन्य धर्मो के मुकाबले बड़े ही आसान व सरल है। जहां अन्य धर्म में निकट संबंधों में शादी नहीं हो सकती ( जैसे हिंदू जैन सिख जाट इत्यादि ) और इन शादी विवाह समारोह में बहुत से धार्मिक कर्मकांड होते हैं कभी-कभी इन्हीं धार्मिक मान्यताओं के चलते बहुत से व्यक्तियों को एक साथी ढूंढने में बहुत दिक्कत होती है कभी-कभी इन्हीं धार्मिक मान्यताओं के कारण बहुत से प्रेमी अपना प्रेम खो देते हैं। और इस कारण विवाह बहुत देर में होता है। जिसके चलते बहुत सी शारीरिक व मानसिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं जो आगे चलकर परेशानी या अनहोनी का कारण बनती हैं। और अगर इन सभी परेशानियों को रोकना है तो एक ही हल नजर आता है कि यदि जल्दी या कम उम्र में और अपने निकट संबंधों में बच्चों का विवाह कर दिया जाए तो इन सभी परेशानी से बचा जा सकता है।
बहुत से ऐसे सवाल जो इस्लाम व मुसलमान की विवाह पद्धति से जुड़े हैं गैर मजहबी लोग हमेशा इन सवालों का जवाब जानने को उत्सुक रहते हैं
उनके कुछ सवाल इस प्रकार हैं…
1. मुसलमान के बच्चे कम उम्र में विवाह क्यों कर लेते हैं।
2. मुसलमान अपनी ही मामी, चाचा, बुआ,मौसी की लड़की या लड़कों से विवाह क्यों करते हैं।
यह दो मुख्य सवाल जो ज्यादातर गैर मुसलमानों के दिमाग में घूमा करते हैं और वह लोग इन सवालों का जवाब जानने को हमेशा उत्सुक रहते हैं।
मुसलमान के बच्चों का कम उम्र में शादी करना कोई षड्यंत्र या अपने धर्म को बढ़ावा देना नहीं है या इसका मकसद ज्यादा बच्चे पैदा करना नहीं है इसका जो असल मकसद है वह मेडिकली और धार्मिक दोनों को ध्यान में रखकर किया जाता है।
मेडिकली तौर पर देखा जाए तो किसी भी लड़के या लड़की का विवाह कम उम्र में ही करना चाहिए क्योंकि इससे वे मेडिकल तौर पर पूरी तरह स्वस्थ होंगे और उनमें कोई शारीरिक समस्या भी नहीं होगी यहीं पर अगर बच्चों की शादी ज्यादा उम्र में की जाती है तो उनमें बहुत सी समस्याओं का खतरा बना रहता है और ज्यादा उम्र में शादी करने वाले लोगों में यह समस्या देखी गई है कि वह शारीरिक रूप से अपने आप को बहुत कमजोर कर लेते हैं अपनी कुछ गलत आदतों के चलते जिसका उन्हें ज्ञान नहीं होता है और जब उनका विवाह होता है तो वह इसके बारे में जानकारी हासिल करते हैं तो उन्हें अपनी गलतियों का एहसास होता है।
दूसरी बात तो यह इस्लामी कानून के अनुसार मुसलमान अपनी ही सगी चचेरी बहन, ममेरी बहन व बुआ की लड़की से शादी कर सकते हैं। क्योंकि इस्लामी कानून में दूध को सर्वपरी माना गया है ना कि खून को।
और दूसरा मैं पहले ही बता चुका हूं निकट संबंधों में शादी करना बहुत सी अनहोनी होने से रोका जा सकता है।
निकट संबंधों में शादी करने के बहुत से लाभ हैं आईए जानते हैं।
1. रिश्तेदार कैसे हैं किस प्रकार के हैं उनका मिजाज कैसा है उनका व्यवहार दूसरों के प्रति कैसा है इन सब की जानकारी होती है।
2. उनका अपने समाज में कितना मान सम्मान है और दूसरों से उनके संबंध कैसे हैं इसकी भी जानकारी होती है।
3. लड़का या लड़की का करैक्टर कैसा है वह उनके घर के बर्ताव को एडजस्ट कर पाएगी कि नहीं यह सब पहले से ही पता होता है।
4. उनके घर में किसी को कोई रोक तो नहीं या निकट समय में कोई घटना तो नहीं घाटी या कोई अपराधिक मामला है या नहीं सब पता होता है।
जबकि दूर के और नए संबंधों में इसकी जानकारी नहीं होती है और जब बाद में पता चलता है तो वह झगड़े का कारण बनती है और दोनों लोग एक दूसरे पर इल्जाम लगाते हैं जिससे वैवाहिक जीवन पर बहुत असर पड़ता है यदि दोनों के बीच कोई तीसरा मतलब कि बच्चा हो गया है तो बच्चे के भविष्य को भी बहुत खतरा होता है।
और मैं एक बात और बताई थी कि इस्लामी कानून के अनुसार दूध ही मान्य होता है खून नहीं....
आइये इसे उदाहरण के जरिए बहुत बारीकी से समझते हैं...
मान लीजिए सलमान और अफसाना दो भाई बहन हैं इनके पिता ने उनकी शादी अपने निकट संबंधों में कर दी मतलब दोनों ही अपने-अपने घर चले गए। कुछ समय बाद सलमान को दो लड़की हुई और अफसाना को दो बीते हुए तो सलमान अपनी दोनों लड़कियों का निकाह अफसाना की दोनों बेटियों से कर सकते हैं लेकिन अफसाना ने कभी सलमान के दोनों लड़कों को दूध पिलाया होगा तो सलमान के दोनों लड़के और अफसाना के दोनों बेटियों के बीच में भी सगे भाई बहन का रिश्ता बन जाएगा और इनका निकाह नहीं हो सकता।
अब तक तो आप समझ ही गए होंगे लेकिन मैं इसे गैर मुसलमानों के लिए और भी सरल तरीके से समझाना चाहता हूं की कौन से रिश्ते हराम है और कौन से रिश्ते हलाल हैं निकाह के संबंध में… मैं कुरान की आयतों के माध्यम से भी समझाने का प्रयास करूंगा।
इस्लाम में निकाह की बुनियाद
निकाह शरीयत के मुताबिक़ इजाज़त से होने वाला समझौता है।
यह रिश्ता सिर्फ जिस्मानी ख्वाहिश पूरी करने के लिए नहीं बल्कि घर-परिवार बसाने, नस्ल चलाने और मोहब्बत व रहमत का ज़रिया है।
कुरआन और हदीस ने बताया कि निकाह के लिए दोनों पक्षों की रज़ामंदी और महर (दहेज की रकम) ज़रूरी है।
किन रिश्तों से निकाह हराम है?
कुरआन शरीफ़ ने साफ़ तौर पर बताया है कि कुछ रिश्ते ऐसे हैं जिनसे हरगिज़ शादी नहीं की जा सकती।
सूरह अन-निसा (4:23) में अल्लाह तआला फरमाता है:
“तुम्हारी माएँ, तुम्हारी बेटियाँ, तुम्हारी बहनें, तुम्हारी फूफियाँ, तुम्हारी खालाएँ, तुम्हारे भाई की बेटियाँ, तुम्हारी बहन की बेटियाँ, तुम्हारी दूध पिलाने वाली माएँ, तुम्हारी दूध की बहनें, तुम्हारी बीवियों की माएँ, तुम्हारी बीवियों की बेटियाँ (अगर बीवी से हमबिस्तरी हो चुकी हो), तुम्हारे बेटे की बीवियाँ, और यह कि दो बहनों को एक साथ निकाह में रखो – ये सब तुम्हारे लिए हराम कर दिए गए।”
हराम रिश्ते (महर्मात)
माँ (जन्म देने वाली और दूध पिलाने वाली दोनों)
बेटी (और पोती-नवासी भी)
बहन
फूफी (पिता की बहन)
खाला (माँ की बहन)
भतीजी
भांजी
दूध वाली माँ
दूध वाली बहन
सास
सौतेली बेटी (बीवी से हमबिस्तरी हो चुकी हो तो)
बहू
दो बहनों को एक साथ बीवी बनाना
इन रिश्तों में निकाह हमेशा के लिए हराम है।
किनसे निकाह जायज़ है?
मुस्लिम औरतें: सबसे पहले एक मुसलमान मर्द अपनी कौम की पाकदामन औरतों से निकाह कर सकता है।
अहले किताब की औरतें: कुरआन (सूरह अल-मायदा 5:5) में इजाज़त है कि पाकदामन यहूदी और ईसाई औरतों से भी मुसलमान मर्द निकाह कर सकता है।
कज़िन से निकाह: इस्लाम में चचेरी, ममेरी, फुफेरी और खाला ज़ाद बहनों से निकाह जायज़ है क्योंकि कुरआन ने इन्हें हराम रिश्तों में शामिल नहीं किया।
आयत (सूरह अल-मायदा 5:5)
“आज तुम्हारे लिए पाक चीज़ें हलाल कर दी गई हैं… और अहले किताब (यहूदी और ईसाई) की पाकदामन औरतें भी तुम्हारे लिए हलाल हैं जब तुम उनका महर अदा कर दो।”
मुस्लिम औरत का निकाह
इस्लाम में मुस्लिम औरत का निकाह सिर्फ़ मुसलमान मर्द से हो सकता है। वजह यह है कि मर्द घर का सरबराह होता है और बच्चे अपने बाप के धर्म पर चलते हैं। अगर औरत किसी गैर-मुस्लिम से निकाह कर ले तो घर का पूरा इस्लामी माहौल बिगड़ सकता है।
आम सवाल-जवाब
क्या मुसलमान कज़िन से निकाह कर सकते हैं?
हाँ, इस्लाम में कज़िन (चचेरी, ममेरी, फुफेरी, खाला ज़ाद) से निकाह जायज़ है।
क्या मुसलमान दो बहनों से शादी कर सकता है?
नहीं, कुरआन ने साफ़ कहा है कि दो बहनों को एक साथ निकाह में रखना हराम है।
क्या मुस्लिम औरत गैर-मुस्लिम मर्द से शादी कर सकती है?
नहीं, मुस्लिम औरत का निकाह सिर्फ़ मुस्लिम मर्द से जायज़ है।
क्या अहले किताब की औरत से निकाह जायज़ है?
जी हाँ, मुसलमान मर्द यहूदी या ईसाई पाकदामन औरत से निकाह कर सकता है, लेकिन मुस्लिम औरत के लिए यह इजाज़त नहीं।
इस्लाम ने निकाह के लिए साफ़ और हिकमत से भरे नियम बताए हैं। कुरआन ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि किन रिश्तों से शादी हराम है और किनसे जायज़। निकाह सिर्फ़ मोहब्बत और ख्वाहिश पूरी करने का नाम नहीं बल्कि एक मज़बूत अहद और बड़ी ज़िम्मेदारी है। इसीलिए अल्लाह ने इसे इंसान की ज़िंदगी का अहम हिस्सा बनाया।
Thanks
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