1. करवा की सच्ची भक्ति की कथा..
बहुत समय पहले की बात है….
एक छोटे से गाँव में करवा नाम की एक सती स्त्री रहती थी।
वह अपने पति से बहुत प्रेम करती थी , उसके लिए उसका संसार सिर्फ उसका “पति” था।
एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया,
परंतु किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था ,
एक भयंकर मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया।
उसकी चीखें सुनकर करवा दौड़ी चली आई।
वह अपने पति को यूँ मरते नहीं देख सकती थी।
उसने अपने आँचल के पवित्र धागे से मगरमच्छ को बाँध लिया और
यमराज को पुकारा ,,,
“हे मृत्यु के देवता! यदि मेरे सतीत्व में सच्चाई है,
यदि मेरा प्रेम निर्मल है,
तो मेरे पति को जीवनदान दो!”
यमराज उसकी भक्ति देखकर काँप उठे।
उन्होंने मगरमच्छ को श्राप देकर भस्म कर दिया और करवा के पति को जीवनदान दे दिया।
करवा के आँसू उस समय ख़ुशी में बदल गए ,,
उसकी भक्ति ने मौत को भी हरा दिया।
इसलिए कहा जाता है ,
“जिस स्त्री का मन सच्चा होता है, उसकी पूजा, उसका व्रत , खुद भगवान स्वीकार करते हैं।”
2.सास-बहू की सीख भरी कथा..
एक बार एक नई नवेली बहू ने अपना पहला करवा चौथ रखा।
सुबह से उसने न जल पिया, न अन्न खाया,
बस हर पल भगवान से यही प्रार्थना की ,
“मेरे पति सदा सुरक्षित रहें, सदा खुश रहें।”
शाम हुई, पर चाँद निकलने का नाम नहीं ले रहा था।
थकी हुई बहू को देखकर सास ने कहा —
“बहू, दीपक को छलनी में रखो, और मान लो कि चाँद निकल आया।”
भोली बहू ने वैसा ही किया और व्रत तोड़ दिया।
थोड़ी ही देर में उसका पति अचानक बेहोश हो गया।
बहू का दिल काँप उठा — आँखों से आँसू झरने लगे।
सास ने कहा ,
“बेटी, तुमने व्रत अधूरा किया, इसीलिए ऐसा हुआ।
अब ईश्वर से सच्चे मन से माफी माँगो।”
बहू ने अगले साल पूरी श्रद्धा से व्रत रखा ,
उसके आँसुओं ने उसकी मन्नत को सच्चा बना दिया।
और तभी चमत्कार हुआ , उसका पति पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गया।
संदेश: सच्चा प्रेम और सच्चा विश्वास , यही स्त्री की सबसे बड़ी शक्ति है।
3. निर्मला और दीपक की करवा चौथ कथा
(आधुनिक भावनात्मक कथा)
दिल्ली शहर में एक नवविवाहित जोड़ा रहता था — निर्मला और दीपक।
दोनों एक-दूसरे से बेहद प्यार करते थे।
निर्मला का यह पहला करवा चौथ था, उसने पूरे उत्साह से व्रत रखा।
सुबह से उसने कुछ नहीं खाया, बस मन में यही सोच रही थी —
“मेरे दीपक की उम्र लंबी हो, वह हमेशा मुस्कुराए।”
शाम तक दीपक ऑफिस में था, और ट्रैफिक में फँस गया।
रात हो गई, और निर्मला की आँखें चाँद नहीं, बल्कि अपने पति का चेहरा ढूँढ रही थीं।
उसने कहा —
“मैं चाँद देखकर नहीं, अपने दीपक को देखकर व्रत तोड़ूँगी।”
जब दीपक घर पहुँचा, थका हुआ था लेकिन जैसे ही निर्मला ने उसे देखा, उसकी आँखों में चमक आ गई।
उसने दीपक के चेहरे को छलनी से देखा और मुस्कुराकर कहा —
“मेरे लिए चाँद यही है।”
दीपक की आँखें भी नम हो गईं।
उस दिन दोनों ने साथ में पहली बार महसूस किया कि —
सच्चा व्रत पेट से नहीं, दिल से रखा जाता है।
✨ संदेश: प्रेम में दिखावा नहीं, बल्कि सच्चा एहसास ही सबसे बड़ी पूजा है।
4. गौरी-शंकर की कथा..
एक दिन माता पार्वती ने भोलेनाथ से पूछा —
“स्वामी, यह बताइए कि करवा चौथ व्रत इतना पवित्र क्यों माना गया है?”
भोलेनाथ मुस्कुराए और बोले —
“देवि, जब तुमने यह व्रत किया था, तब तुम्हें मुझे पति रूप में प्राप्त होने का वरदान मिला था।
यह व्रत नारी के सौभाग्य की रक्षा करता है।
जो स्त्री पूरे मन से यह व्रत करती है,
उसके जीवन में सुख, शांति और अखंड सुहाग बना रहता है।”
माता पार्वती ने तब कहा —
“हर नारी को यह व्रत अवश्य करना चाहिए,
क्योंकि यह प्रेम, निष्ठा और आस्था का प्रतीक है।”
संदेश: करवा चौथ सिर्फ व्रत नहीं, बल्कि पति-पत्नी के पवित्र प्रेम का उत्सव है।
5. सात भाइयों और बहन की लोककथा..
एक गाँव में एक प्यारी सी बहन थी, जिसके सात भाई थे।
वह अपने भाइयों के घर करवा चौथ का व्रत रखती थी।
पूरा दिन बिना खाए-पिए अपने पति की दीर्घायु के लिए प्रार्थना करती रही।
भाइयों से उसकी हालत देखी नहीं गई।
उन्होंने एक दीपक जलाया और पेड़ के पीछे रखकर कहा —
“देखो बहन, चाँद निकल आया।”
भोली बहन ने छलनी से देखा और व्रत तोड़ दिया।
कुछ देर बाद उसके पति की तबियत अचानक बिगड़ गई।
वह सदमे में टूट गई, रोती रही, ईश्वर से पुकारती रही —
“हे भगवान! मुझसे गलती हो गई।”
माँ भगवती ने उसकी प्रार्थना सुनी और बोलीं —
“बेटी, अगले वर्ष श्रद्धा और विश्वास से व्रत करना,
सब ठीक हो जाएगा।”
अगले साल उसने पूरे मन से करवा चौथ का व्रत रखा —
आँसूओं में भी विश्वास था, और प्रेम में भी भक्ति।
उसके पति को फिर से जीवन मिला।
संदेश: स्त्री की आस्था भगवान से भी बड़ी होती है।
अंत प्रार्थना (भावनात्मक समापन)
“हे माँ पार्वती, हमें वही श्रद्धा, वही निष्ठा और वही प्रेम दो,
जिससे हमारा हर रिश्ता मजबूत बने,
हमारे पतियों की आयु लंबी हो,
और हर सुहागिन के जीवन में सदा सौभाग्य का दीप जलता रहे।”
| जय माँ गौरी! जय करवा माँ! |
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