यहूदी (Jews) या यहूदियों का समुदाय विश्व के सबसे प्राचीन और लचीले समुदायों में से एक है। यहूदी धर्म, जिसे यूदावाद (Judaism) भी कहा जाता है, दुनिया का प्राचीनतम एकेश्वरवादी धर्म माना जाता है। इसकी जड़ें लगभग ४००० साल पुरानी हैं। आज विश्व में लगभग १४-१५ मिलियन यहूदी हैं, जिनमें से अधिकांश इजराइल और अमेरिका में रहते हैं। यह समुदाय न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि इतिहास, संस्कृति, विज्ञान, साहित्य और अर्थव्यवस्था में भी अपनी अनोखी छाप छोड़ता रहा है।
यहूदी धर्म की शुरुआत पैगंबर इब्राहीम अलैहिस्सलाम से मानी जाती है, जो ईसा पूर्व लगभग २००० वर्ष पहले हुए थे। पैगंबर इब्राहीम अलैहिस्सलाम को तीनों इब्राहिमी धर्मों—यहूदी, ईसाई और इस्लाम—का पितामह माना जाता है। पैगंबर इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पुत्र पैगंबर इसहाक अलैहिस्सलाम और पोते पैगंबर याकूब अलैहिस्सलाम (जिन्हें इजराइल भी कहा जाता है) के वंशजों को यहूदी या इजराइलियों के रूप में जाना जाता है। पैगंबर याकूब अलैहिस्सलाम के १२ पुत्रों से १२ कबीलों का निर्माण हुआ, जिनमें से एक का नाम यहूदा था। बाद में इसी नाम पर यह समुदाय "यहूदी" कहलाया।
यहूदी इतिहास में पैगंबर मूसा अलैहिस्सलाम का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। पैगंबर मूसा अलैहिस्सलाम ने मिस्र के फराओ के अत्याचार से यहूदियों को मुक्ति दिलाई और उन्हें "दस आज्ञाएं" (Ten Commandments) प्रदान कीं, जो यहूदी धर्म के मूल आधार हैं। इन आज्ञाओं में एक ईश्वर (याहवे) में विश्वास, मूर्तिपूजा का विरोध, नैतिक जीवन आदि शामिल हैं। यहूदियों का मुख्य धार्मिक ग्रंथ तनख़ (Tanakh) है, जिसमें तोरा (Torah—पाँच पुस्तकें), नबियों की किताबें और अन्य लेख शामिल हैं। इसके अलावा तालमुद (Talmud) और मिद्रश जैसे ग्रंथ यहूदी विचारधारा और कानूनों की व्याख्या करते हैं।
यहूदी धर्म का मूल सिद्धांत एक ईश्वर में अटूट विश्वास है। वे मानते हैं कि ईश्वर ने संसार की रचना की और मानव जाति को नैतिक मार्ग दिखाया। यहूदी जीवन में "मिट्ज़वाह" (Mitzvot) यानी ईश्वर की आज्ञाओं का पालन बहुत महत्वपूर्ण है। इनमें शब्बात (सैटरडे को विश्राम का दिन), कोशर भोजन (विशेष नियमों वाला भोजन), प्रार्थना, दान (त्सेदाका) और शिक्षा शामिल हैं। यहूदियों में शिक्षा को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। प्राचीन काल से ही वे अपने बच्चों को तोरा की शिक्षा देते आए हैं। यही कारण है कि यहूदियों में साक्षरता की दर हमेशा ऊँची रही।
यहूदियों का इतिहास संघर्ष और लचीलापन की कहानी है। प्राचीन काल में वे कनान (वर्तमान इजराइल क्षेत्र) में बसे। पैगंबर दाऊद अलैहिस्सलाम और सुलैमान अलैहिस्सलाम के समय में यरुशलम में पहला इबादतगाह बनाया गया, जो यहूदी धर्म का केंद्र था। बाद में बेबीलोनियन निर्वासन (Exile), रोमन साम्राज्य के अत्याचार, आदि घटनाओं ने उन्हें दुनिया भर में बिखेर दिया। इसे "डायस्पोरा" (Diaspora) कहा जाता है। सदियों तक यूरोप, एशिया और अफ्रीका में बिखरे यहूदियों को अक्सर उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। मध्य युग में यूरोप में "पोग्रोम" (हत्याकांड) और "ब्लड लिबेल" जैसे झूठे आरोपों का शिकार होना पड़ा।
२०वीं सदी की सबसे बड़ी त्रासदी होलोकॉस्ट (Holocaust) थी, जिसमें नाजी जर्मनी ने लगभग ६० लाख यहूदियों की हत्या कर दी। यह मानव इतिहास का एक काला अध्याय है। होलोकॉस्ट के बाद १९४८ में इजराइल राज्य की स्थापना हुई, जो यहूदियों के लिए एक स्वदेश की प्राप्ति थी। इजराइल आज एक छोटा लेकिन तकनीकी और सैन्य रूप से मजबूत देश है। वहाँ यहूदी संस्कृति फल-फूल रही है, लेकिन वहाँ चल रहे संघर्ष भी विश्व को प्रभावित करते हैं।
यहूदियों की संस्कृति विविध है। वे विभिन्न समुदायों में बँटे हैं—अशकेनाजी (यूरोपीय यहूदी), सेफार्दी (स्पेनिश/पूर्वी यहूदी), मिजराही आदि। भारत में यहूदियों का इतिहास भी रोचक है। भारत यहूदियों के लिए सदियों से शरण स्थल रहा है। बेनी इजराइल (महाराष्ट्र), कोचीन यहूदी (केरल), बगदादी यहूदी (कोलकाता, मुंबई) जैसे समुदाय भारत में सदियों से बसते आए हैं। भारत में यहूदियों पर कभी धार्मिक उत्पीड़न नहीं हुआ, जो भारत की सहिष्णुता को दर्शाता है। आज भारत में उनकी संख्या कम (लगभग ५०००) रह गई है क्योंकि कई इजराइल चले गए, लेकिन उनकी विरासत जैसे कोचीन के सिनेगॉग और मुंबई के यहूदी अस्पताल आदि अब भी मौजूद हैं।
यहूदियों ने विश्व को कई योगदान दिए हैं। आइंस्टीन, फ्रायड, मार्क्स, जॉन नेल्सन जैसे वैज्ञानिक और विचारक यहूदी थे। सिनेमा, संगीत, साहित्य में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है। आधुनिक इजराइल में स्टार्टअप संस्कृति, कृषि तकनीक, चिकित्सा और पानी प्रबंधन में वे विश्व नेता हैं। "ड्रिप इरिगेशन" जैसी तकनीक इजराइल से आई।
यहूदियों के त्योहार भी उनके इतिहास और विश्वास को प्रतिबिंबित करते हैं। पासओवर (पेसाच) मिस्र से मुक्ति की याद दिलाता है। हनुक्का इबादतगाह की पुनर्स्थापना और रोशनी का त्योहार है। यॉम किप्पुर पश्चाताप और प्रायश्चित का दिन है। रोश हशाना नया साल मनाया जाता है। इन त्योहारों में परिवार, प्रार्थना और विशेष भोजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यहूदी समाज में परिवार की मजबूती प्रसिद्ध है। विवाह, बार मिट्ज़वा (लड़के के १३ वर्ष) और बात मिट्ज़वा (लड़की के १२ वर्ष) जैसे संस्कार बड़े उत्सव के साथ मनाए जाते हैं। वे दान और सामाजिक न्याय पर जोर देते हैं। "त्सेदाका" सिर्फ दान नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण समाज बनाने का हिस्सा है।
आज के युग में यहूदियों का समुदाय चुनौतियों का सामना कर रहा है। कुछ जगहों पर एंटी-सेमिटिज्म (यहूदी विरोध) अभी भी मौजूद है। इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष वैश्विक चर्चा का विषय बना हुआ है। फिर भी यह समुदाय अपनी पहचान, भाषा (हिब्रू) और परंपराओं को जीवित रखे हुए है। हिब्रू भाषा को पुनर्जीवित करने का यहूदियों का प्रयास विश्व में अनोखा उदाहरण है।
यहूदियों से हमें कई सबक मिलते हैं—शिक्षा का महत्व, कठिनाइयों में भी आशा बनाए रखना, नैतिक मूल्यों का पालन और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना। वे साबित करते हैं कि छोटी संख्या वाले समुदाय भी बड़े योगदान दे सकते हैं।
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में यहूदियों की कहानी सह-अस्तित्व की मिसाल है। हम सभी को एक-दूसरे के इतिहास, धर्म और संस्कृति को समझना चाहिए, ताकि सद्भाव और शांति बनी रहे।
Blog Comments (0)