आज जुम्मा का दिन है सभी को जुम्मा मुबारक, तो दोस्तों आज मैं जब मस्जिद में जुम्मा की नमाज के लिए बैठा तो इमाम साहब हर जुम्मे की तरह ही इस जुम्मे भी एक वाक्या इस्लाम का बयान कर रहे थे और यह वाक्या था दौर-ए-जाहिलिअत का जब बेटियों को जिंदा दफन कर दिया जाता था जिसे सुनकर वहां बैठे लगभग सभी नमाजी के आंख में आंसू थे सभी सिसक सिसक कर रो रहे थे।। चलिए सबसे पहले मैं आपको इमाम साहब द्वारा बयान किए गए इस वाकिया को लिखता हुँ।
कहते हैं अरब के रेगिस्तान में उसे वक्त मतलब की दौर ए जहिलियत के समय लोग अपनी घर में पैदा हुई नवजात बेटियों को जिंदा दफन कर देते थे इनके बेटियों को दफन करने के कई कारण होते थे उसे समय बेटियों को बोझ समझा जाता था उनका मानना था कि उनके पैदा होने से उनके ऊपर सिर्फ आर्थिक बोझ बढ़ेगा और बेटियां किसी काम की नहीं होती है इसके अलावा कुछ क़बीले यह सोचते थे कि अगर बेटी बड़ी होकर दुश्मन के हाथ लग जाए या किसी तरह की बेइज़्ज़ती हो जाए, तो यह पूरे परिवार की “इज़्ज़त” पर धब्बा होगा। इस डर से वे जन्म के बाद ही उसे मार देते थे। उस दौर में लगातार लड़ाइयाँ होती थीं। लोग डरते थे कि उनकी बेटियाँ क़ैद कर ली जाएंगी या गुलाम बना ली जाएंगी, इसलिए वे पहले ही उन्हें दफन कर देते थे।
इस दौर में एक आदमी ऐसा था जिसने अपनी बेटी को जो की पूरे 2-3 साल की हो गई थी उसे अभी तक ना मारा था ना दफन किया था तो उसके समाज के लोग उसे ताना देते थे उसे बेटी को लेकर और और उसे बहुत बुरा भला कहते थे। जिससे तंग आकर उसने एक दिन या फैसला ले लिया।। और फिर…
रेगिस्तान की तपती रेत पर सूरज ढलने को था। एक आदमी अपने नन्ही सी बेटी का हाथ थामे दूर वीराने की तरफ़ बढ़ रहा था। बच्ची मासूम थी, उसकी आँखों में भरोसा और चेहरे पर मुस्कान थी। वह रास्ते भर अपने अब्बा से सवाल करती—“हम कहाँ जा रहे हैं?”—और वह हर बार मुस्कुराकर कहता, “बस, थोड़ी दूर और।”
चलते-चलते वे एक सुनसान जगह पर पहुँचे। आदमी ने कांपते हाथों से ज़मीन खोदनी शुरू की। बच्ची खेल-खेल में उसकी मदद करने लगी, उसे क्या मालूम था कि यह गड्ढा उसके लिए ही खोदा जा रहा है।
जब गड्ढा तैयार हो गया, तो आदमी की आँखों में आँसू भर आए। दिल काँप रहा था, लेकिन समाज का डर और झूठी इज़्ज़त उसके जज़्बात पर भारी पड़ रही थी। उसने बेटी को प्यार से उठाया… बच्ची मुस्कुराई, जैसे कोई खेल हो।
जैसे ही उसने उसे गड्ढे में उतारना चाहा, बच्ची ने मासूमियत से उसके कपड़ों पर लगी मिट्टी झाड़ते हुए कहा—
“अब्बा, आपके कपड़े गंदे हो गए हैं…”
यह सुनकर उसका दिल टूट गया, लेकिन उस दौर की बेरहम सोच ने उसे पत्थर बना दिया था। उसने भारी दिल से मिट्टी डाल दी… और एक मासूम ज़िंदगी उसी रेत में दफ़्न हो गई।
यही वह कहानी थी जिसने आज की जुम्मा की नमाज को बहुत भारी बना दिया था……..
अरब की वह तपती रेत और पत्थराए दिल जब संगदिली की इंतहा को छू रहे थे, तो मासूम कलियों को खिलने से पहले ही मिट्टी की तहों में दबा दिया जाता था। वह एक ऐसा तारीक दौर था जहाँ बेटी की पैदाइश को बोझ और ज़िल्लत की निशानी समझा जाता था और ममता की गोद को उजाड़ना वहाँ का दस्तूर बन चुका था। इंसानियत सिसक रही थी और औरत का वजूद अपने तहफ़्फ़ुज़ और वक़ार के लिए पुकार रहा था।
फिर सहरा के उफ़ुक़ पर रहमत-ए-आलम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ का ज़ुहूर हुआ तो काइनात का ज़र्रा-ज़र्रा मुस्कुरा उठा। आप ﷺ ने सिर्फ़ पैग़ाम-ए-हक़ ही नहीं दिया बल्कि औरत को वह मक़ाम अता किया जिसका तसव्वुर भी उस मुआशरे में मुहाल था। आप ﷺ ने बेटी को बोझ के बजाय “रहमत” क़रार देकर उसे जीने का हक़ दिया और फ़रमाया कि जिसने बेटियों की अच्छी परवरिश की, वह जन्नत में मेरे साथ ऐसे होगा जैसे हाथ की दो उंगलियाँ।
आप ﷺ की आमद से औरत को माँ के रूप में वह अज़मत मिली कि जन्नत को उसके क़दमों तले बिछा दिया गया। बीवी के रूप में उसे घर की मलिका और जीवन साथी का दर्जा मिला और बहन के रूप में उसे प्यार व एहतराम का सायबान अता हुआ। वह औरत जो कल तक विरासत में तक़सीम होती थी, आप ﷺ की लाई हुई शरीअत ने उसे विरासत का हक़दार बनाया और उसे समाज का एक मुअज्ज़िज़ और फ़आल रुक्न बना दिया।
सच्ची बात तो यह है कि औरत के वजूद में रंग और उसकी ज़िंदगी में खुशबू रसूलुल्लाह ﷺ के क़दमों की धूल से आई है। आप ﷺ ने अपनी लख़्त-ए-जिगर हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की आमद पर खड़े होकर उनका इस्तक़बाल करके रह्ती दुनिया तक के बापों को यह सिखा दिया कि बेटी वह फूल है जिसकी खुशबू से घर महकता है, उसे दफ़्न नहीं बल्कि पलकों पर बिठाया जाता है। आज औरत के पास जो वक़ार और हक़ूक़ हैं, वह सब उस अज़ीम मोहसिन ﷺ का सदक़ा हैं जिन्होंने अंधेरों में डूबी इंसानियत के इस तबक़े को रौशनी और ज़िंदगी की नवेद सुनाई।
ये मनाज़िर ख़वातीन की अज़मत का अहम सबूत हैं
इस्लाम में औरत का दर्जा, महिलाओं के अधिकार,हज़रत मुहम्मद ﷺ की शिक्षाएं
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