पसमांदा एक फारसी शब्द है, जिसका अर्थ है “पीछे छूट गए” या “दबाए गए”। भारतीय मुस्लिम समाज में पसमांदा मुसलमान उन पिछड़े और दलित वर्ग के मुसलमानों को कहा जाता है, जो ऐतिहासिक रूप से हिंदू समाज के दलित (अर्जल) और अन्य पिछड़े वर्ग (अजलाफ) से इस्लाम धर्म अपनाने वाले लोग हैं। मुस्लिम समाज को मुख्यतः तीन वर्गों में बांटा जाता है — अशरफ (उच्च वर्ग या सवर्ण मुसलमान, जैसे सैयद, शेख, मुगल, पठान आदि), अजलाफ (पिछड़े मुसलमान) और अर्जल (दलित मुसलमान)। इनमें अजलाफ और अर्जल को मिलाकर ही पसमांदा कहा जाता है।
ये लोग मुख्य रूप से भारत के स्थानीय मूल निवासी थे, जिन्होंने विभिन्न सामाजिक-आर्थिक कारणों से इस्लाम अपनाया, लेकिन धर्म परिवर्तन के बाद भी उन पर पुरानी जातिगत भेदभाव की छाया बनी रही। अशरफ मुसलमान खुद को विदेशी मूल (अरब, फारस, मध्य एशिया) से जोड़कर श्रेष्ठ मानते हैं, जबकि पसमांदा ज्यादातर कारीगर, किसान, बुनकर, दर्जी आदि पारंपरिक पेशों से जुड़े हैं। अनुमानों के अनुसार भारत के कुल मुस्लिम आबादी में पसमांदा मुसलमानों की संख्या 80-85 प्रतिशत तक है, जबकि अशरफ केवल 15 प्रतिशत के आसपास हैं।
पसमांदा मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति काफी पिछड़ी हुई है। वे मुस्लिम समुदाय के अंदर भी जातिगत भेदभाव का शिकार होते हैं — मस्जिदों, धार्मिक संस्थाओं, शादी-ब्याह और नेतृत्व में उनकी भागीदारी सीमित रहती है। सरकारी नौकरियों, संसद-विधानसभाओं और अल्पसंख्यक संस्थानों में भी उनकी प्रतिनिधित्व बहुत कम है। सच्चर समिति रिपोर्ट और अन्य अध्ययनों में भी उनकी पिछड़ापन उजागर हुआ है।
पसमांदा आंदोलन की शुरुआत 1998 में बिहार के अली अनवर अंसारी (अंसारी जाति से) ने पसमांदा मुस्लिम महाज की स्थापना से की। इससे पहले भी 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में मुस्लिम पिछड़ों के संगठन बनने शुरू हो गए थे। आंदोलन का मुख्य उद्देश्य मुस्लिम समाज के अंदर समानता, आरक्षण, दलित मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। पसमांदा नेता अक्सर कहते हैं कि मुस्लिम राजनीति लंबे समय तक अशरफ नेताओं के वर्चस्व में रही, जिससे पसमांदा वर्ग उपेक्षित रहा।
आज पसमांदा मुसलमान सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। वे ओबीसी आरक्षण का लाभ लेते हैं, लेकिन दलित मुसलमान अनुसूचित जाति आरक्षण की मांग करते हैं। राजनीतिक रूप से भी यह वर्ग महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि उनकी बड़ी संख्या के कारण विभिन्न पार्टियां इनकी ओर ध्यान दे रही हैं।
संक्षेप में, पसमांदा मुसलमान मुस्लिम समाज का बहुसंख्यक लेकिन सबसे पिछड़ा हिस्सा हैं, जो इस्लाम की समानता की शिक्षा और वास्तविकता के बीच की खाई को उजागर करते हैं। उनका संघर्ष न सिर्फ आर्थिक उन्नति, बल्कि मुस्लिम समाज के अंदर जातिगत समानता के लिए भी है।
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