पैदाइश: 3 नवम्बर 1618, दाहोद (गुजरात)
वफ़ात: 3 मार्च 1707, औरंगाबाद (महाराष्ट्र)
वालिद: बादशाह शाहजहां
वालिदा: मुमताज़ महल
बीवी: दिलरस बानो बेगम
हुकूमत: 31 जुलाई 1658 से 3 मार्च 1707 तक
पूरा नाम: अबू मुज़्ज़फर मुइउद्दीन मोहम्मद
लक़ब: आलमगीर
ख़ानदान: तैमूरीद (मुग़ल सल्तनत)
मज़हब: सुन्नी इस्लाम
पैदाइश और बचपन
3 नवम्बर 1618 को जब शहजादा खुर्रम (बाद में शाहजहां) और मुमताज़ महल के घर छटे बच्चे का जन्म हुआ, तब हिंदुस्तान पर उनके दादा जहांगीर की हुकूमत थी। औरंगज़ेब की पैदाइश पर बड़े स्तर पर जश्न मनाया गया — अवाम को दीदार कराया गया, खैरात में जवाहरात और हाथी बांटे गए।
औरंगज़ेब शाहजहां के तीसरे बेटे थे। उनसे बड़े दारा शिकोह और शाह शुजा, और छोटे भाई मुराद थे — ये चारों मुमताज़ महल से ही थे। मुग़ल खानदान में तख़्त के लिए हमेशा मुकाबला होता था, और औरंगज़ेब बचपन से ही इस माहौल में पले-बढ़े।
जंग का मैदान और हुकूमत का सफर
महज़ 16 साल की उम्र में ही औरंगज़ेब को शासन संभालने की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने 1635 से 1657 तक बल्ख, बुंदेलखंड, कांधार, गुजरात, मुल्तान और दक्कन में मुग़ल हुकूमत की सीमाओं की हिफ़ाज़त की।
जब 1657 में शाहजहां बीमार पड़े, तब चारों भाइयों के बीच तख़्त की जंग छिड़ी। लेकिन अपनी काबिलियत, रणनीति और हिम्मत के बल पर औरंगज़ेब हिंदुस्तान का बादशाह बन गए।
आलमगीरी दौर – हुकूमत का सुनहरा युग
औरंगज़ेब आलमगीर ने 49 बरस तक 15 करोड़ लोगों पर हुकूमत की, और मुग़ल सल्तनत को उसके चरम (उरूज) तक पहुंचाया। उनकी सल्तनत काबुल से बंगाल की खाड़ी और दक्कन के दक्षिणी छोर तक फैली हुई थी। उन्होंने शरीयत के कानूनों को लागू किया और "फ़तवा-ए-आलमगीरी" जैसे मशहूर इस्लामी क़ानूनी दस्तावेज़ को तैयार करवाया। इंसाफ़परस्ती और दीनी लगन की वजह से हर मज़हब के लोग उनकी दाद देते थे।
आलमगीर की सादगी और दीनी लगन
हालांकि औरंगज़ेब के दौर में हिंदुस्तान दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका था — 1690 में सालाना आमदनी 450 मिलियन डॉलर और जीडीपी 90 बिलियन डॉलर थी (जो दुनिया का लगभग 25% थी) — फिर भी उन्होंने सादा ज़िंदगी अपनाई। वे अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए क़ुरान की किताबत (हाथ से लिखना) और टोपियाँ बुनना पसंद करते थे। उन्होंने 1660 तक पूरा क़ुरान हिफ्ज़ कर लिया, यानी वे हाफ़िज़-ए-क़ुरान थे।
जंगे और कामयाबियाँ
अपने शासनकाल में उन्होंने 30 से ज़्यादा जंगें लड़ीं, जिनमें से 11 जंगों की कमान खुद संभाली। उन्होंने सल्तनत को 4 मिलियन वर्ग किलोमीटर तक फैलाया। उनकी हुकूमत में हिंदुस्तान का नाम पूरी दुनिया में ताक़त, अदल (न्याय) और दीनी मज़बूती के प्रतीक के रूप में लिया जाने लगा।
विरासत
1707 में औरंगज़ेब का देहांत औरंगाबाद में हुआ। लेकिन उनका नाम आज भी इंसाफ़, ईमानदारी और दीनी निष्ठा की मिसाल के तौर पर लिया जाता है। उन्होंने अपने कर्म और सादगी से साबित किया कि एक बादशाह भी अल्लाह का बंदा होकर रह सकता है।
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