इस्लाम के आगमन से पहले अरब समाज धार्मिक रूप से बहुदेववादी (Polytheistic) था। उस समय अलग-अलग कबीलों के अपने-अपने देवता और बुत (मूर्तियाँ) थे। इतिहासकार बताते हैं कि मक्का और उसके आसपास सैकड़ों बुतों की पूजा होती थी और काबा के आसपास लगभग 360 मूर्तियाँ मौजूद थीं। इनमें से तीन सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली देवियाँ थीं — अल-लात (Al-Lat), अल-उज्ज़ा (Al-Uzza) और मनात (Manat) — जिन्हें अरब के बड़े हिस्से में विशेष सम्मान प्राप्त था। जहिलियत के जमाने में अरब के लोग इन देवियों को अल्लाह की बेटियां कहते थे। उनका मानना था अगर वे लोग इन देवियों से कोई मन्नत मांगेंगे तो वह उनकी बात को अल्लाह तक पहुंचा देगी और अल्लाह अपनी बेटियों की बात को कभी भी नकार नहीं सकते। और बदले में वह इनके मंदिरों में बड़े-बड़े चढ़ावे चढ़ाते थे चादरे वगैरा पुजारी को देते थे। हालांकि जब रसूल अल्लाह को पैगंबरी प्राप्त हुई। तो उन्होंने चारों तरफ अल्लाह के पैगाम को फैलाना चालू कर दिया जिसका परिणाम यह हुआ की बहुत से लोग इस्लाम की ओर आकर्षित हुए और मुसलमान हो गए जो कि बाद में सहाबी कहलाए और अल्लाह इन्हीं साहबियों के द्वारा इन देवीयों के मंदिर और इनको ध्वस्त करवाया।
अल्लाह कुरान में इन बुतो का जिक्र किया है….
कुरान पाक में सूरह नज्म (53:19-23)
أَفَرَأَيْتُمُ اللَّاتَ وَالْعُزَّىٰ ﴿١٩﴾
وَمَنَاةَ الثَّالِثَةَ الْأُخْرَىٰ ﴿٢٠﴾
أَلَكُمُ الذَّكَرُ وَلَهُ الْأُنْثَىٰ ﴿٢١﴾
تِلْكَ إِذًا قِسْمَةٌ ضِيزَىٰ ﴿٢٢﴾
जाहिलियत के ज़माने के तीन बड़े बुतों लात, उज्जा और मनात का ज़िक्र है। क्या तुमने लात और उज्जा को देखा? और तीसरे मनात को? ... ये तो बस वो नाम हैं जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादाओं ने गढ़ लिए हैं। अल्लाह ने इनके बारे में कोई दलील नाजिल नहीं की।
लात: थकीफ़ कबीले का बुत था, ताइफ़ में एक सफ़ेद पत्थर पर बना हुआ।
उज़्ज़ा: मक्का के पास नखला घाटी में तीन बड़े पेड़ों पर कायम था। क़ुरैश और दूसरे कबीले इसे बहुत मानते थे।
मनात: मदीना के पास क़ुदैद (मशल्लल) में एक पत्थर था। औस, ख़ज़रज और ख़ुज़ाआ कबीले इसकी पूजा करते थे।
अल्लाह तआला ने इन्हें झूठे माबूद बताया और शिर्क की सख्त निंदा की। उज्जा क़ुरैश और दूसरे अरब क़बीलों का बहुत बड़ा देवी माना जाता था।
तो आज इस ब्लॉक में हम जानेंगे इन तीन बड़ी देवियों का इतिहास…..
अल-लात, अल-उज्ज़ा और मनात — इतिहास और मान्यता
अल-लात (Al-Lat)
थकीफ़ कबीले का बुत था, ताइफ़ में एक सफ़ेद पत्थर पर बना हुआ।अल-लात एक प्रमुख देवी थी जिसकी पूजा विशेष रूप से ताइफ़ क्षेत्र में होती थी। उसका मंदिर इतना प्रतिष्ठित था कि उसकी देखभाल के लिए विशेष लोग नियुक्त रहते थे। इस्लामी परंपराओं के अनुसार रसूल अल्लाह ﷺ ने सहाबियों को इसे हटाने का आदेश दिया और उसके स्थान पर मस्जिद बनाई गई। ताइफ़ के लोगों द्वारा पूजी जाने वाली इस मूर्ति को नष्ट करने के लिए अबू सुफ़यान को भेजा गया था।
अल-उज्ज़ा (Al-Uzza)
अल-उज्ज़ा को शक्ति और संरक्षण की देवी माना जाता था और उसकी पूजा नख़ला घाटी में की जाती थी।उसका पवित्र स्थान पेड़ों और पत्थरों से जुड़ा हुआ था जहाँ बलि दी जाती थी। इस्लामी परंपरा में वर्णन मिलता है कि रसूल अल्लाह ﷺ के आदेश से सहाबी खालिद बिन वलीद ने जाकर इस मूर्ति और उसके मंदिर को नष्ट किया। (यह घटना ऐतिहासिक रिवायतों और परंपराओं में वर्णित है।)
यह वाकिया सही बुखारी
(हदीस न.4298 की तशरीह)
फतह मक्का के बाद रसूलुल्लाह ﷺ ने हजरत खालिद बिन वलीद (जिन्हें "सैफुल्लाह" यानी अल्लाह की तलवार कहा जाता है) को उज्जा के बुत को तोड़ने का हुक्म दिया। उज़्ज़ा का बुत नखला नाम की जगह पर था, जहां तीन बड़े पेड़ थे और एक मंदिर था। वहां पुजारी भी थे। हज़रत खालिद वहां पहुंचे। उन्होंने पहले पेड़ काटे, फिर दूसरे को, और तीसरे पेड़ के पास पहुंचे तो अचानक एक काली औरत (नंगी, बाल बिखरे हुए, चीखती हुई, डरावनी शक्ल वाली – यानी चुड़ैल जैसी) सामने आई। वह चीख रही थी और हमला करने वाली थी। यह असल में शैतान या जिन्न था जो उस बुत में रहता था और लोगों को गुमराह करता था। हज़रत खालिद रजी. अल्लाह ने तलवार से उसे मार डाला और बुत को पूरी तरह तोड़ दिया।
जब वे वापस आए और नबी ﷺ को बताया तो आप ﷺ ने फरमाया: अब वो कभी वापस नहीं आएगी" (यानी शैतान जिन्न हार चुका है और उसकी ताकत खत्म हो गई) कयामत के क़रीब वाली हदीस में फरमाया गया कि लोग फिर उसकी पूजा करेंगे। हज़रत आयशा रज़ि अल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि उन्होंने रसूलुल्लाह ﷺ को फरमाते सुना:"रात-दिन का सिलसिला (यानी दुनिया का चक्र) तब तक खत्म नहीं होगा जब तक लोग लात और उज़्ज़ा की इबादत नहीं करने लगेंगे।
(अरबी: لاَ تَقُومُ السَّاعَةُ حَتَّى يَعْبُدَ النَّاسُ اللَّاتَ وَالْعُزَّىٰ)
सहीह मुस्लिम…. हदीस नंबर 2907
मतलब लोग खुद गुमराह होकर दोबारा शिर्क शुरू कर देंगे
मनात (Manat)
मनात को भाग्य, नियति और मृत्यु की देवी माना जाता था और कई कबीलों, विशेषकर मदीना के औस और ख़ज़राज, द्वारा उसकी पूजा की जाती थी। उसका मंदिर लाल सागर के पास क़ुदैद क्षेत्र में था और लोग अच्छे भाग्य के लिए उसे चढ़ावा देते थे।इस्लामी स्रोतों में उल्लेख है कि रसूल अल्लाह ﷺ ने सहाबियों को भेजकर इसे भी हटवा दिया — कुछ रिवायतों में इसका श्रेय अबू सुफ़यान या हज़रत अली रज़ि. को दिया जाता है।
क्यों हटाए गए ये बुत?
इस्लाम का मूल संदेश तौहीद (एकेश्वरवाद) है — यानी केवल एक अल्लाह की इबादत। उस समय अरब समाज में बुतपरस्ती व्यापक थी और लोग जानवरों की बलि, चढ़ावा और अन्य धार्मिक कर्मकांड करते थे। इस्लामी दृष्टिकोण में यह माना गया कि ये प्रथाएँ हज़रत इब्राहीम की एकेश्वरवादी परंपरा से विचलन थीं। इसलिए रसूल अल्लाह ﷺ ने मक्का विजय के बाद काबा और अन्य स्थानों से बुतों को हटाकर एकेश्वरवाद स्थापित किया।
अल-लात, अल-उज्ज़ा और मनात अरब के प्राचीन धार्मिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं। ये देवियाँ उस दौर के सामाजिक विश्वासों, भय और आशाओं का प्रतिनिधित्व करती थीं। लेकिन इस्लाम के आगमन के बाद एकेश्वरवाद की स्थापना के साथ इनकी पूजा समाप्त हो गई और उनका स्थान नई धार्मिक व्यवस्था ने ले लिया।
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