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author Alpha Kalam Aug 07, 2025 5 min

हलाला क्या है और कैसे किया जाता है?.........

निकाह हलाला कैसे किया जाता है?......

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इस्लामी समाज में जब एक मुस्लिम पुरुष अपनी बीवी को तलाक दे देता है तो वह उसे दोबारा शादी नहीं कर सकता

 

 इसलिए तलाक बहुत सोच समझ कर , सभी घरवालों की सहमति के साथ, मियां बीवी आपस में विचार करके, एक दूसरे से अलग होने की कसम ले ।।

मुस्लिम समाज में तलाकशुदा बीवी से दोबारा शादी करने की प्रक्रिया को निकाह हलाला कहा जाता है

आखिर निकाह हलाला क्या है और यह कैसे किया जाता है या सवाल सभी गैर मुस्लिम (हिंदू ,सिख ,इसाई ,जैन पारसी)के मन में उठता है

निकाह हलाला को लेकर अन्य समाज में बहुत से भरम फैलाए गए हैं यह भरम उनके द्वारा फैलाए गए हैं जो कि मुस्लिम समाज से नफरत करते हैं 

उन्होंने अन्य लोगों को बता रखा है कि मुस्लिम पुरुष जब अपनी बीवी का हलाला करवाते हैं तो वह किसी के साथ भी अपनी बीवी को एक रात के लिए सुला देते है चाहे वह भाई हो चाहे उनके पिता हो चाहे वह कोई मौलवी हो

दोस्तों जबकि असलियत यह नहीं है जब आप इसकी असलियत जानेंगे तो आप हैरान रह जाएंगे क्योंकि असल में ऐसा कुछ होता ही नहीं है

दरअसल जब मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को तलाक दे देता है तो वह तलाकशुदा औरत अपने घर लौट जाती है और उसे औरत के मां-बाप अपनी तलाकशुदा लड़की का विवाह बड़ी धूमधाम से किसी और मर्द से कर देते हैं , अब मान लीजिए कभी भविष्य में वह तलाकशुदा औरत और दूसरा पति के बीच में कोई अनबन हो गई या उसका दूसरा पति की किसी कारणवश मृत्यु हो गई तो उसका जो पहले पति था जिसने उसे पहले तलाक दिया था अगर उसे दोबारा निकाह कर ली तो इसमें कोई बुराई नहीं है यही असल निकाह हलाला होता है

अब कुछ लोग पूछेंगे कि तलाक के तुरंत बाद निकाह क्यों नहीं कर सकते तो मेरे दोस्त तलाक के दौरान 4 महीने के अंदर अगर मियां बीवी अपने संबंधों को सुधारना चाहे तो तलाक रद्द कर दिया जाता है और बिना किसी निकाह हलाला के वह दोबारा शादी कर सकते हैं।।

 इस्लाम की इस प्रथा को कैसे बदनाम किया गया।

 

हलाला (या निकाह-ए-हलाला) एक इस्लामी प्रथा है, जिसका उद्देश्य तलाक के मसले में गंभीरता और सोच-समझ के साथ निर्णय को सुनिश्चित करना है। हलाला का मूल उद्देश्य यह था कि पति-पत्नी के बीच तीन तलाक के बाद रिश्ता दोबारा इतनी आसानी से न जुड़ सके जब तक महिला किसी और पुरुष से निकाह करके वैवाहिक जीवन न बिताए और फिर किसी कारणवश वह रिश्ता भी तलाक पर समाप्त हो जाए। लेकिन आधुनिक समय में इस शरीयती प्रावधान को तोड़-मरोड़ कर जिस तरह से पेश किया गया और बदनाम किया गया, वह न केवल इस्लामी शिक्षाओं के खिलाफ है, बल्कि महिलाओं के सम्मान के लिए भी अपमानजनक है।

1. मूल उद्देश्य की अनदेखी:

हलाला का मकसद कभी भी किसी महिला को जबरन किसी और पुरुष से संबंध बनाने के लिए मजबूर करना नहीं था। यह व्यवस्था तलाक को हल्के में लेने से रोकने के लिए बनाई गई थी। कुरान और हदीस में इसका स्पष्ट निर्देश है कि अगर तलाक तीन बार हो गया है, तो पति-पत्नी का रिश्ता खत्म हो चुका है, और वे तभी दोबारा साथ रह सकते हैं जब महिला किसी और से निकाह कर वैवाहिक जीवन बिताए और फिर तलाक हो जाए।

2. मीडिया और सोशल मीडिया का विकृत चित्रण:

वर्तमान समय में मीडिया और सोशल मीडिया पर हलाला को बेहद विकृत और अश्लील रूप में प्रस्तुत किया गया। टीवी डिबेट्स, यूट्यूब चैनल्स और न्यूज पोर्टलों पर हलाला को जानबूझकर “रात भर के निकाह” या “सेक्सुअल समझौते” की तरह दिखाया गया। यह पूरी तरह से शरीयत और इस्लामी शिक्षाओं के खिलाफ है।

3. कुछ मौलवियों और ढोंगी लोगों की गलत हरकतें:

कुछ अवसरों पर कुछ गैर-ज़िम्मेदार और भ्रष्ट मौलवियों द्वारा हलाला के नाम पर महिलाओं का यौन शोषण किया गया, जिसने इस प्रथा को और भी बदनाम किया। ऐसे मामलों को मीडिया ने सनसनीखेज ढंग से प्रस्तुत किया, जिससे पूरे मुस्लिम समाज की छवि को धूमिल किया गया।

4. राजनीतिक उद्देश्यों के लिए प्रयोग:

हलाला को लेकर कई बार राजनीतिक दलों ने भी लाभ उठाने की कोशिश की। इसे मुस्लिम समाज की “पिछड़ी सोच” के रूप में प्रचारित किया गया, जबकि यह एक सीमित और अपवादस्वरूप मामला होता है। तीन तलाक के मुद्दे के बाद हलाला को भी बहस का विषय बनाकर मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप का प्रयास किया गया।

5. इस्लामी विद्वानों की चुप्पी:

बहुत से इस्लामी विद्वानों और संगठनों ने समय पर इस पर स्पष्ट स्टैंड नहीं लिया, जिससे हलाला को लेकर गलतफहमियाँ बढ़ती गईं। जबकि सच्चाई यह है कि "प्रयोगशाला जैसे हलाला" (pre-planned halala) की इस्लाम में सख्त मनाही है और इसे गुनाह माना गया है।

निष्कर्ष:

हलाला को जिस तरह से बदनाम किया गया है, वह इस्लाम की शिक्षाओं और उसकी नैतिकता के विरुद्ध है। यह एक गंभीर सामाजिक और धार्मिक मसला है जिसे गलत हाथों में पड़कर विकृत कर दिया गया। आवश्यकता है कि मुस्लिम समाज इसके सही स्वरूप को समझे, और ऐसे लोगों से सतर्क रहे जो इस्लाम के नाम पर इसके नाम को बदनाम कर रहे हैं। साथ ही, समाज, मीडिया और न्याय व्यवस्था को भी चाहिए कि वह जिम्मेदारी के साथ इस विषय को समझे और प्रस्तुत करे।

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